वाजपेयी: कुछ कविताएँ, कुछ यादें

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मेरा पहला सामना अस्सी के दशक में पंजाब के संगरूर जिले के छोटे से शहर धूरी में एक इंटर कॉलेज भाषण प्रतियोगिता में हुआ। वह उस समय विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के नेता थे। वह मुख्य अतिथि थे और मैं प्रतियोगी। उस अवसर पर अपने भाषण में उन्होंने अपनी एक लोकप्रिय कविता सुनाई। “हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचउस समय मैं यह तो जानता था कि हिंदू धर्म क्या है पर मुझे यह पता नहीं था कि हिंदुत्व क्या है, जो शब्द मेरे खयाल से बाद में अस्तित्व में आया।

तो इस तरह मेरा वाजपेयी से परिचय यूं हुआ कि वह एक कवि राजनीतिज्ञ थे, जिन्हें अपने हिंदू होने पर गर्व था।

कई साल बाद, मुझे उनसे मिलने का एक और मौका मिला जब वह प्रधानमंत्री (1999-2004) थे और मैं नई दिल्ली में समाचार एजेंसी यूनाईटेड न्यूज़ ऑफ इंडिया में नया रिपोर्टर था।

प्रधानमंत्री के आवास पर कविता

दिलचस्प यह है कि इस बार भी मुझे उनसे कविता सुनने का अवसर मिला। मौका प्रधानमंत्री के आवास 7, रेसकोर्स पर कविता पाठ का था जहां श्री वाजपेयी ने अपने पुराने ज़माने के कुछ मित्र कवियों को बुलाया था। हालांकि प्रधानमंत्री कार्यालय से संबंधित रिपोर्टिंग मेरा एक वरिष्ठ सहकर्मी करता था लेकिन मुझे वह कार्यक्रम कवर करने के लिए भेजा गया क्योंकि मेरी कविता में गहरी रुचि थी। मीडिया के अलावा कुछ साहित्यिक हस्तियां और राष्ट्रीय राजधानी के चमकते चेहरे वहां मौजूद थे।
वाजपेयी ने अपनी पसंदीदा कविताएं उस शाम पढ़ीं और खूब तालियां बटोरीं। कविता पाठ के बाद प्रधानमंत्री ने चायनाश्ते पर मेज़बानी भी की जहां मुझे उनसे एक संक्षिप्त एक्सक्लूज़िव इंटरव्यू करने का मौका मिल गया । पर वह किस्सा यहां नहीं बताऊंगा क्योंकि उसके बारे में मैं पहले एक लेख लिख चुका हूं।

आज वाजपेयी की तीसरी पुण्यतिथि पर आइये, हम उन्हें उनकी कुछ कविताओं के ज़रिये याद करते हैं।
‘दो अनुभूतियां‘ वाजपेयी का लोकप्रिय दोहरा गीत है जो कवि के दो एकदम विपरीत मूड अवसाद और उत्साह को दर्शाता है।

पहला है ‘गीत नहीं गाता हूं‘, जो ऐसी मनोदशा दर्शाता है जहां कवि निराश है। यह ऐसे शुरू होता है:

बेनकाब चेहरे हैं, दाग़ बड़े गहरे हैं
टूटता तिल्सिम आज, सच से भय खाता हूं
गीत नहीं गाता हूं
दूसरा गीत, ‘गीत नया गाता हूं‘ आशा और नयी शुरुआत के बारे में बात करता है।
टूटे हुए तारों से फूटे बसंती स्वर,
पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात, कोयल की कुहक रात
प्राची में अरुणिम की रेख देख पाता हूं
गीत नया गाता हूं…
अंधेरे में रौशनी ढूंढना

‘आओ फिर से दिया जलाएं‘ वाजपेयी की एक और कविता है जो नकारात्मकता के अंधेरे से सकारात्मकता की रौशनी ढूंढ निकालने की बात करती है।

आओ फिर से दिया जलाएं
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें
बुझी हुई बाती सुलगाएं
आओ फिर से दिया जलाएं

बुढ़ापा और खोने का अहसास

एक और कविता ‘जीवन बीत चला‘ में बूढ़ा होता कवि इस पर विचार करता है कि कैसे कोई अतीत और भविष्य की चिंता में अपना आज खोता है। इसकी एक झलक देखिये:
जीवन बीत चला
कल कल करते आज
हाथ से निकले सारे
भूत भविष्य की चिंता में
वर्तमान की बाज़ी हारे
पहरा कोई काम न आया
रसघट रीत चला
जीवन बीत चला

मृत्यु औैर शाश्वत जीवन का गीत

एक कविता ‘मौत से ठन गई‘में वाजपेयी खुद को मौत का सामना करने के लिए तैयार करते दिखते हैं। वह वास्तव में मृत्यु को मुठभेड़ की चुनौती देते हैँ:
ठन गयी, मौत से ठन गयी…
मौत की उमर क्या है?
दो पल भी नहीं/जिंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं/मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं/लौट कर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं/ तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आना, सामने वार कर, फिर मुझे आज़मा
वास्तव में वाजपेयी मौत से कुछेक साल जूझने के बाद 16 अगस्त 2018 को विदा हुए थे।

—इंडिया न्यूज़ स्ट्रीम

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