अब तुलसीदास को लेकर उठा विवाद
राजनीतिक दल उतरे मैदान में

नई दिल्ली। अब पिछले कुछ दिनों से गोस्वामी तुलसीदास को लेकर देश में विवाद छिड़ गया है। राजनीतिक दल और लेखक भी इस विवाद में आमने सामने आ गए हैं।जनवादी लेखक संघ ने तो इस विवाद पर अपना बयान भी जारी किया है।एक धड़ा सोशल मीडिया पर तुलसीदास का बचाव कर रहा दूसरा धड़ तुलसीदास के खिलाफ निंदा अभियान चला रहा है।

जलेस ने अपने बयान में बिहार के शिक्षा मंत्री एवम राजद नेता चंद्रशेखर के रामचरितमानस संबंधी बयान पर हो रहे चौतरफे हमले को वह दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय बताया है।

गौरतलब है कि श्री चंद्रशेखर ने एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में कहा था कि “रामचरितमानस जैसे धार्मिक पाठों ने उसी तरह घृणा फैलाने का काम किया जिस तरह मनुस्मृति और गोलवलकर के “बन्च ऑफ़ थॉट्स” ने विभिन्न दौरों में सामाजिक विभेद को बढ़ाने का काम किया।” उन्होंने मानस के कुछ वर्णाश्रम-समर्थक और स्त्री-विरोधी अंशों को उद्धृत भी किया।

जलेस का कहना है कि श्री चंद्रशेकर ने तुलसीदास के जो उद्धरण पेश किए हैं उसमें कोई तथ्यात्मक ग़लती नहीं थी। लेकिन उनके इस बयान के बाद भाजपा नेताओं ने उन पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाया और उन्हें मंत्री-पद से हटाए जाने की माँग की। उन्होंने यह चुनौती भी दी कि अगर मंत्री में साहस है तो वे इसी तरह की बात इस्लाम के बारे में कहकर दिखाएँ।”

जलेस ने प्रेस विज्ञप्ति में कहा है कि अपने आरोपों के ज़रिए भाजपा नेताओं ने यह बिलकुल साफ़ कर दिया कि भाजपा दलितोत्थान और नारी शक्ति के जितने भी नारे लगाए, हिंदुत्व के रूप में, वे हिंदू धर्म के जिस संस्करण को अनुकरणीय मानते हैं, वह वर्णाश्रमी श्रेणीक्रम के आधार पर ही समाज के पुनर्गठन में विश्वास रखता है।”

जलेस का कहना है “यह आश्चर्यजनक है कि न सिर्फ़ भाजपा, बल्कि जदयू और काँग्रेस ने भी मंत्री के इस बयान को निंदनीय माना है। इनमें से कोई भी संभवतः इस बात से वाक़िफ़ नहीं हैं कि हिंदी साहित्य के दायरे में लंबे अरसे से तुलसी की विचारधारा को लेकर तीखे विवाद रहे हैं। यशपाल, रांगेय राघव, गजानन माधव मुक्तिबोध, नागार्जुन आदि से लेकर अनेक समकालीन आलोचकों-रचनाकारों तक ने तुलसी के इस पक्ष को निंदनीय माना है। वहीं रामविलास शर्मा और उनके विचारों से सहमत विद्वानों की भी पूरी एक क़तार है जो तुलसीदास में ऐसे अंशों को या तो प्रक्षिप्त मानकर उनका बचाव करते हैं, या फिर तुलसीदास को जनता का, जनता के दुख-दर्दों का कवि मानकर उनके इस पक्ष की पूरी तरह से अनदेखी करने की कोशिश करते हैं।”

जलेस का कहना है कि तुलसीदास के बारे में इस तरह की बहस की इजाज़त ही न दी जाए और उनके बारे में ऐसा बयान देनेवाले पर भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाया जाए, यह किसी भी क़ीमत पर स्वीकार्य नहीं है।

जनवादी लेखक संघ राजद नेता के ऐसा बयान देने की आज़ादी का समर्थन करता है और उनके खिलाफ़ जगह-जगह दायर किए जा रहे मामलों को दुर्भाग्यपूर्ण मानता है। सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण तो काशी के एक धार्मिक नेता जगतगुरु परमहंस का बयान है जिसमें यह कहा गया है कि अगर एक हफ़्ते के भीतर बिहार के शिक्षामंत्री पर विधिक कार्रवाई नहीं की गई तो वे घोषणा करेंगे कि जो उस शिक्षामंत्री की जिह्वा काटकर लाएगा, उसे दस करोड़ की राशि पुरस्कार-स्वरूप दी जाएगी। ऐसी घोषणा सीधे-सीधे भारतीय संविधान और क़ानून के शासन की अवहेलना है, जिस पर प्रशासन को अविलंब कार्रवाई करनी चाहिए।

— इंडिया न्यूज़ स्ट्रीम

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