हिंदी फिल्मों की महान गायिका आशा भोसले केवल गायिका नहीं थी बल्कि लाखों करोड़ों लोगों के जीवन की आशा भी थी। उनकी गायिकी ने लोगों के जीवन में उल्लास, उमंग, रोमांच ,रोमांस, मादकता ,चंचलता, अल्हड़ता ,शोखी , बिंदासपन सब कुछ दिया जो हर व्यक्ति को अपनी जिंदगी में चाहिए होता है।इसके बिना जीवन का मतलब नहीं अर्थ नहीं।आशा एक उद्याम नदी की तरह बलखाती हुई सबके जीवन में आई।वह एक झरने की तरह ,एक पुकार की तरह आई मुस्कान की तरह आई।
92 वर्षीय आशा कल अपनी बड़ी बहन लता की तरह पंचतत्व में विलीन हो गई। मुम्बई के शिवाजी पार्क में उनक़ा अंतिम संस्कार कर दिया गया।उनके पार्थिव शरीर पर जब तिरंगा लपेटा गया और मातमी धुन बजायी गयी तो लाखों लोगों की आंखें नम हो गईं।
इस तरह शमशाद बेगम अमीर बाई कर्नाटकी राजकुमारी सुरैया गीता दत्त दिलराज कौर सुमन कल्याणपुरी से चली आ रही महिला गायिकी की आखिरी कड़ी टूट गयी।
1948 से अपने कैरियर की शुरुआत करनेवाली आशा ने 12 हज़ार से अधिक गाने गाए पर उन्होंने अपने जीवन के बहुत उतार चढ़ाव देखे थे। दुख भी देखे थे। ज़ख्म भी देखे थे।
पुराने जमाने के महान संगीतकार खेमचंद प्रकाश और उनके साउंड रिकार्डिस्ट ने तो” जान पहचान “फ़िल्म की के गाने के लिए आशा ही नहीं किशोर को भी यह कहते हुए रिजेक्ट कर दिया था कि इनकी आवाज़ गायक बनने लायक नहीं पर दोनों ने अपनी प्रतिभा से दुनिया को लोहा मनवाया और दोनों लेजेंडरी गायक बने।
एक समय आया जब कुछ लोगों की नज़र में आशा लता से भी आगे निकल गयी।खासकर गायन की विविधता के मामले में।
पर यह भी सच है कि दोनों का स्थान अप्रतिम हैं।।दोनों बड़ी गायिका हैं
पर इससे भी नकारा नहीं जा सकता कि आशा में लता दी भी समाई हैं लेकिन लता में आशा नहीं समाई है।बस एक गाना “ओ जाने “जां, तेरा यह हुस्न जवां “लता ने आशा की तरह गाया है।
आशा की गायिकी लता से नितांत भिन्न हैं
लता समर्पण की गायिका हैं , आशा आज़ादी की गायिका हैं।आशा ने स्त्री गायिकी में महिला सशक्तिकरण को मजबूत बनाया और पुरुषत्व को चुनौती दी।यह काम गीता दत्त सुरैया शमशाद बेगम ने भी नहीं किया। पर आशा केवल शोखी चंचलता की ही गायिका नहीं है।वह दुख तकलीफ और उदासी की भी गायिका हैं।
उनका गायन एक दीन हीन समर्पित विरहणी कातर घरेलू स्त्री का गायन नहीं था बल्कि यौनिकता ,उद्दाम कामना ,स्त्री के उल्लास ,वर्चस्व और दबंग स्त्री की खुशियों का गायन था ।
आशा कई मायनों में लता से भिन्न थी और स्वाधीन स्त्री की आवाज़ थी।दमखम वाली गायिका था।वे स्त्रैण नहीं थी।वे बिस्तर पर एक जिंदादिल स्त्री थीवे हमेशा आंसू बहनेवाली नायिका नहीं थी।वे दम मारो दम वाली स्त्री थी।वे एक बोल्ड गायिका थी – पिया तू अब तो आ जा ,ये मेरा दिल प्यार का दीवाना ,ओ मेरे सोना रे सोना रे
आओ हुजूर तुमको सितारों में जरा सा झूम लूं मैँ ,सजना है मुझे सजना के लिए ,
रात अकेली है बुझ गए दिए, आगे भी जाने न तू , खोतुबा ऊऊ खोतुबा, आइए मेहरबान की गायिका थी।
उनक़ा जीवन भी बताता है वह विद्रोही थी।
उनकी आवाज़ में भी एक विद्रोह था।वे rebel singer थी।लता की तरहsubdued नहीं।उन्होंने भारतीय स्त्री की पारंपरिक छवि को तोड़ा ।
वे मर्दों को निमंत्रण देने वाली गायिका हैं।वे सकुचनेवाली गायिका नहीं।
आशा भोसले मशहूर थिएटर एक्टर और क्लासिकल सिंगर दीनानाथ मंगेशकर की बेटी और महान गायिका लता मंगेशकर की छोटी बहन हैं। जब वो सिर्फ 9 साल की थीं तब उनके पिता का निधन हो गया था, जिसकी वजह से उन्होंने बहन लता मंगेशकर के साथ मिलकर परिवार को सहयोग करने के लिए गाना शुरू किया और अपने बल बूते पर अपनी मंजिल पाई।उनकी मदद उनकी बड़ी बहन लता ने नहीं की।आशा अपने दमखम पर आगे बढ़ी।
16 साल की उम्र में आशा भोसले ने बड़ी बहन लता के 31 साल के सेक्रेटरी गणपतराव भोसले से भागकर शादी की थी। लता जी और उनका परिवार इस शादी के सख्त खिलाफ था। इसके कारण उन्होंने आशा से लंबे समय तक बातचीत बंद कर दी थी।
शादी के बाद आशा भोसले को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा और वह घरेलू हिंसा का शिकार भी हुईं। वह जिंदगी से इतनी निराश हो गई थीं कि खुद को खत्म करना चाहती थीं। 1960 में वह पहले पति से अलग हो गईं।
जब आशा भोसले की पहली शादी टूट गई और वह अपने तीन बच्चों (हेमंत, वर्षा और आनंद) के साथ वापस अपने परिवार के पास आईं, तब धीरे-धीरे दूरियां कम होनी शुरू हुईं।
आशा भोसले ने दूसरी शादी संगीतकार आरडी बर्मन से की थी। दोनों की पहली मुलाकात 1956 में हुई थी।आर डी बर्मन उंनसे 6 साल छोटे थे।
लेकिन इस शादी में भी बहुत अड़चन आयी।
बर्मन की मां ने कहा कि
“अगर शादी करनी है… तो मेरी लाश के ऊपर करना।”
गणपत राव से अलग होने के बाद आशा
उन दोनों की मुलाकात १९६६ में फ़िल्म तीसरी मज़िल के दौरान हुई थी..
दोनों ने साथ मिलकर ओ हसीनी ज़ुल्फ़ों वाली.. ओ मेरे सोना रे सोना जैसे कई गाने रिकॉर्ड किए…
उस समय आरडी बर्मन अपने पिता से कुछ अलग करना चाहते थे..तो जैज, कैबरे का ट्रेंड लाते हुए उन्हें आशा भोंसले की आवाज़ सही लगी..और उन्होंने साथ मिलकर पिया तू अब तो आजा..दम मारो दम जैसे बनाये और आशा भोंसले को कैबरे क्वीन कहा जाने लगा. बर्मन की पहली शादी रीटा से हुई थी और घरेलू कलह की वजह से वो होटल में रहते थे..
और अपनी पत्नी से तलाक लेने के बाद जब उन्होंने आशा से शादी करने का फ़ैसला किया तो पूरा परिवार ख़िलाफ़ हो गया था..
उनकी माँ ने तो साफ़ इंकार कर दिया था,उन्होंने साफ़ कह दिया था कि
जब तक वो ज़िंदा है उनकी शादी नहीं हो सकती..
फिर भी अगर तुम दोनों ने शादी की तो आशा को मेरी लाश के ऊपर से गुजरना होगा..वो आशा से प्यार करते थे, लेकिन माँ के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं कर पाए।
कुछ सालों बाद जब उनकी माँ बहुत बीमार रहने लगी और उन्होंने किसी को पहचाना भी बंद कर दिया,तब आरडी बर्मन और आशा भोंसले ने 1980 में शादी कर ली थी..
लेकिन यहाँ भी ख़ुशी ज़्यादा दिन नहीं टिकी, शादी के 14 साल 1994 में आरडी बर्मन का देहांत हो गया और आशा भोंसले टूट गई..
वे ओपी नैयर ही थे जिन्होंने 1950 दशक में आशा भोंसले की आवाज़ के जादू को पहचाना ।
नैय्यर साहब ने पहली बार आशा ताई की आवाज़ में जो वेस्टर्न मॉड्यूलेशन था उसका सही यूज़ किया और मंगू से शुरू हुआ सफ़र नया दौर तक पहुँच गया। नया दौर फ़िल्म के गाने“उड़े जब जब जुल्फ़े तेरी..जैसे गानों ने आशा ताई को सुपरस्टार बना दिया.. जिसका संगीत ओपी नैय्यर ने दिया थ.दोनों ने साथ में कम से कम 300 से ज्यादा गाने बनाये।ओपी नैय्यर और आशा भोंसले का साथ 14 साल तक चला लेकिन 1972 में ये जोड़ी अलग हो गई और फिर कभी साथ नहीं आए।यह दोनों के जीवन का त्रासद पहलू है।
इस जोड़ी का आखरी गाना फ़िल्म प्राण जाए पर वचन ना जाए के लिए रिकॉर्ड किया गया था..जिसे १९७३ में अवार्ड भी मिला था लेकिन उसे लेने आशा ताई नहीं गई थी,
ओपी नैयर ने उनकी तरफ़ से ट्रॉफी ली।
लेकिन घर वापस लौटते समय उन्होंने वो ट्रॉफी चलती कार से सड़क पर फेंक दी थी
आशा का एक गाना है जिसमें गुलजार के अल्फाजों को उन्होंने रूह में उतार दिया है-
मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है
ओ सावन के कुछ भीगे भीगे दिन रक्खें हैं
और मेरे इस खत में लिपटी रात पड़ी है
वो रात बुझा दो
मेरा वह सामान लौटा दो “
इस गीत में अलग होने का जो दर्द पड़ा है. उसे आशा भोसले ने जीवंत कर दिया है. जब यह गीत कोई सुनता है तो भावुक हो उठता है।
प्राण जाये पर वचन न जाये का गीत.. चैन से मुझको कभी आपने जीने न दिया /जहर भी चाहा पीना आपने पीने न दिया..भी कम दर्दीला गीत नहीं है. इसकी धुन ओ पी नैयर ने बनायीं थी जिस पर फ़िल्म फेयर अवार्ड मिला था.
आशा भोसले के गायन में जो शोखी है वह किसी अन्य गायिका के कंठ में नही है.
उनके गीतों में जो मादकता वह तत्काल गिरफ्त में लेती है. उनका रेंज बहुत बड़ा था. उनके भीतर लता मंगेश्वर से अधिक रंग औऱ खुशबू थी।. जहाँ उन्होंने शोखी भरे गीत गाये वही संजीदा गीतों को भी स्वर दिया .उन्होंने तीसरी कसम फ़िल्म का चर्चित गीत –पान खाये सैयां हमरो , मलमल के कुर्ते पे छींट लाल लाल जैसा गीत गाया जो लोक धुन पर आधारित था।
उन्होंने गम्भीर गीत भी गाये ।वक़्त फ़िल्म का गीत .. आगे तू जाने न तू पीछे भी जाने न तू. जो कुछ है बस यहीं पल है.
उमराव जान अदा में उन्होंने गीत गाये हैं जैसे. इन आँखों की मस्ती में / फ़िल्म क्या है आप मेरी जान लीजिये. यह भी देखिये कि इस फ़िल्म की नायिका रेखा पर उनकी आवाज कितनी फबती है. उनके गीतों का जादू अलग था. उसकी मिठास अद्भुत थी.
आशा के गीत हर दम लोगों को जिंदगी के सफर में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहेंगे।
— इंडिया न्यूज स्ट्रीम











