नीरज की जीत का जश्न मनाएं पर देश के संघर्षरत खिलाड़ियों की पीड़ा को न भुलाएं हम

नीरज की जीत का जश्न मनाएं पर देश के संघर्षरत खिलाड़ियों की पीड़ा को न भुलाएं हम
चंदर शेखर लूथरा

विजेता को पसंद करना हर कोई चाहता है!

और यदि विजेता कोई नीरज चोपड़ा जैसा हो, भारत का पहला-पहला ट्रैक एंड फील्ड स्वर्ण पदक विजेता, तो आश्चर्य कैसा कि हर प्रकार के राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों में उसके लिए अपना विशेष लगाव दिखाने के लिए होड़ मची है।

यह करने में भी कोई बुराई नहीं है, खासकर जब पूरा देश इस 23 वर्षीय युवक की शानदार सफलता का जश्न मना रहा है। यह भी कोई भूलने वाली बात नहीं है कि स्वतंत्र भारत को यह सफलता तब मिली है जब देश आजादी का 75वां वर्ष मनाने जा रहा है।

नीरज पर इनामों और दरियादिली की बरसात हो रही है।

अगर कोई कार्पोरेट किसी लक्जरी एसयूवी की घोषणा कर रहा है, तो विभिन्न राज्य सरकारें पानीपत के भालाफेंक खिलाड़ी के लिए करोड़ों रुपयों के इनाम की घोषणा कर रही हैं।

यह सभी घोषणाएं भारत को एक ‘खेलों के देश‘ के रूप में पहचान मिलने का आभास रचती हैं। पर क्या शनिवार शाम से जो हम देख रहे हैं, वह सही तस्वीर है?

जवाब स्पष्ट रूप से ‘‘नहीं“ है!

ऐसा ही शोर तब मचा था जब 13 साल पहले राइफल शूटर अभिनव बिंद्रा 2008 बीजिंग ओलपिंक में पहले स्वर्ण पदक विजेता बने थे।

तब देश को खेलों के देश में बदलने के वायदों की वैसी ही बरसात हुई थी जैसी चीन में 70 के दशक के अंत में और 80 के दशक में 1984 लॉस एंजेलिस खेलों से पहले की स्थिति थी। बिंद्रा पर भी करोड़ों की बारिश की गई, जिसके वह हकदार भी थे, लेकिन जो वायदे किये गये थे, उन्हें पूरा नहीं किया गया।

बिंद्रा का समय आज के समय से थोड़ा अलग था।

2006 से भारत सरकार ने खेलों के लिए काफी पैसा खर्च करना शुरू किया जिसका सीधा कारण था कि 2010 कॉमनवेल्थ खेलों की मेज़बानी भारत ने नयी दिल्ली में करनी थी। किसी भी और देश की तरह भारत ने एथलीट के प्रशिक्षण के लिए और इंफ्रास्ट्रक्चार खड़ा करने के लिए काफी पैसा रखा था।

नतीजा सबके सामने था। भारत ने न सिर्फ दिल्ली में कॉमनवेल्थ खेलों में बेहतरीन प्रदर्शन किया बल्कि 2012 लंदन ओलंपिक में सर्वाधिक छह मेडल जीते।

फोकस का अभाव

जैसाकि खेल हमारे राजनीतिज्ञों के लिए वोट नहीं जुटा सकते, राजनीतिक दलों, पहले कांग्रेस और फिर भारतीय जनता पार्टी के लिए खेल फिर पीछे चला गया।

मुद्रास्फीति की दर से तुलना करते हुए बजटीय आबंटन देखा जाए तो 2012 लंदन खेलों के बाद से ही गिरने लगा। कभी-कभार एशियाई खेलों या ओलंपिक खेलों के वर्ष में सरकार को केंद्रीय बजट में अतिरिक्त आबंटन करते देखा गया।

लेकिन 2021-22 का बजट एक अनूठे कारण से अलग था। सरकार ने खेल बजट में 230 करोड़ से अधिक की कटौती की यह जानते हुए भी टोक्यो ओलंपिक निकट ही थे। आप कोविड महामारी को या आर्थिक मंदी के कारण सरकार की सिकुड़ती आय को दोष दे सकते हैं लेकिन इस तर्क में तब कोई दम नहीं रह जाता जब देखा जाता है कि सरकार नई संसद या सेंट्रल विस्टा के निर्माण के लिए 13000 करोड़ रुपये खर्च कर रही है।

वास्तविक मुद्दा यहां भारत की एक के बाद एक सरकारों की नीयत है। खिलाड़ी हमेशा जनता के बीच त्वरित प्रचार पाने के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले प्यादे मात्र रहे हैं।

वर्तमान समय भी अलग नहीं है। आर्थिक मोर्चे पर संघर्ष के समय और संसद को सही तरीके से चलाने में मुश्किलों का सामना करने वाली सरकार के सामने जनता का ध्यान भटकाने के लिए ओलंपिक पदक आने का और कोई सही समय नहीं हो सकता था।

अन्यथा, क्यों न तो खेल मंत्री और न ही इस सरकार का कोई नुमाइंदा नीरज चोपड़ा के पक्ष में आया जब उनके जर्मन कोच ने भारत में एथलीट के लिए गलत प्लानिंग व अनफिट डाईट को लेकर शिकायत की थी।

और ध्यान दीजिये, जर्मन कोच ओव हॉन यह शिकायत अपने शिष्य के टोक्यो के फाइनल इवेंट से डेढ़ महीना पहले की ही है। यहां यह भी बताना जरूरी है कि 58 वर्षीय जर्मन अकेले व्यक्ति हैं जिन्होंने 100 मीटर से दूर भाला फेंका है।

15 जून को कोच ने देश के शीर्ष खेल संगठनों – भारतीय खेल प्राधिकरण (एसएआई) और भारतीय एथलेटिक्स महासंघ (एएफआई) पर खेलों के महाकुंभ के लिए एथलीटों की तैयारी के लिए “पर्याप्त“ न करने का आरोप लगाया था।

नीरज के उत्थान के लिए जिम्मेदार कोच ने कहा था, “ओलंपिक के लिए प्रशिक्षण अनियोजित था और डाईट एथलीट के लिए फिट नहीं थी।“

कोच ने यह भी आरोप लगाया था कि उन्हें, जिस करार से खुश नहीं थे, पर हस्ताक्षर के लिए “ब्लैकमेल“ किया गया। प्रशिक्षण और खेलों के लिए उनकी यूरोप यात्रा की जिम्मेवारी संभालने वाले कार्पोरेट हाऊस जेएसडब्ल्यू स्पोर्ट्स की जरूर उन्होंने तारीफ की।

पटियाला के राष्ट्रीय खेल संस्थान, जहां नीरज का यूरोप जाने से पहले प्रशिक्षण हो रहा था, की स्थितियों के बारे में कोच ने कहा था, “पटियाला में तापमान बहुत अधिक था और हम या तो अलसुबह अभ्यास कर पा रहे थे या फिर शाम छह बजे के बाद।“

यह तो जब जेएसडब्ल्यू ने नीरज और कोच को यूरोप ले जाने में मदद की तो उसका सही स्थितियों में प्रशिक्षण हो सका। नीरज के कोच की बात मानें तो एसएआई और एएफआई ने कुछ नहीं किया।

कल सुधार लें

अब जब प्रधानमंत्री मोदी ने सभी पदक विजेताओं को स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले पर बुलाया है, देश के लिए इससे बेहतर मौका नहीं हो सकता “खेल राष्ट्र‘‘ बनने की दिशा में कदम बढ़ाने का।

और इस दिशा में पहला और सबसे जरूरी कदम यह घोषणा करना है कि खिलाड़ियों का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए सभी सरकारों व निजी क्षेत्र में भी दो फीसदी अनिवार्य कोटा हो। चूंकि अधिकांश खिलाड़ी गरीब वर्ग से आते हैं जहां उनके अभिभावक आजीविका कमाने के लिए भी संघर्ष करते हैं, वहां नौकरी की सुरक्षा किसी भी उभरते खिलाड़ी के लिए जरूरी है।

देश भर में स्टेडियमों के दरवाजे हर उभरती प्रतिभा के लिए बिना एक पैसा लिये सैदव खुले रहने चाहिए। प्रदेशों की राजधानियों में हमारे पास पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर है लेकिन इसके अधिकांश हिस्से की देखरेख नहीं होती और सही लोगों के लिए इसका समुचित इस्तेमाल नहीं हो पाता।

समय की मांग है कि भविष्य में खेलों की मांग पूरी करने के लिए देश में समर्पित खेल विश्वविद्यालय हों। खेल सिर्फ दौड़ना या निशाना लगाना नहीं है बल्कि खेल आरोग्य, खेल प्रशिक्षण और खेल मनोविज्ञान का समावेश भी है, जो दुनिया भर में खेल विकास का अविभाज्य अंग हैं।

उदाहरण के लिए, हमारे सभी खिलाड़ी चोट लगने या रिकवरी के लिए विदेशी खेल आरोग्य विशेषज्ञों से संपर्क करते हैं। भारत में समर्पित (खेल) चिकित्सक या मनोविज्ञानी दुर्लभ हैं। ऐसे समय में जब कोविड महामारी ने हम सबको विचलित कर रखा है, खिलाड़ियों के मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखने की जरूरत है।

नीरज के कोच को भी भारत में तीन वर्ष बिताने के बाद यही लगा। उन्होंने कहा कि जब वह भारत आये, उन्हें लगा कि वह कुछ बदल सकेंगे लेकिन साई या एएफआई के लोगों के साथ मिलकर यह करना शायद बहुत मुश्किल है।

उन्होंने इसका कारण इन संगठनों में जानकारी की कमी और अज्ञान बताया। उन्होंने शिविरों या प्रतिस्पर्धाओं में किसी भी शीर्ष एथलीट के लिए आवश्यक पोषण व सप्लीमेंट्स की कमी की शिकायत की। सरकार की टॉप्स योजना भी इन मामलों में मदद करने में विफल रही है।

अंत में, कोच ने अधिकारियों पर उनके करार से पीछे हटने का भी आरोप लगाया। उन्होंने खेलों से पहले कहा, “कोचिंग स्टाफ की वेतन वृद्धि का वायदा सरकारी अधिकारियों ने कभी पूरा नहीं किया और कुछ को तो ब्लैकमेल किया गया कि यदि वह करार पर हस्ताक्षर नहीं किये तो उनका पैसा उन्हें नहीं मिलेगा।“

पर जो हुआ, सो हुआ। नई शुरुआत कभी भी हो सकती है खासकर जब सरकार के अपने लोगों ने यह चर्चा चलाई है कि प्रधानमंत्री मोदी से पहले किसी ने भी खिलाड़ियों से इस तरह बात नहीं की थी!“

इसे हम फेस वैल्यू पर ही लें। देश को विकासशील खेल राष्ट्र बनाएं। अगले दशक में यह लक्ष्य हासिल करने के लिए आवश्यक निधि व बजट प्राप्त करें।

रोम एक दिन में नहीं बना था, इसी तरह भारत केवल बातें बनाकर खेल राष्ट्र नहीं बन सकेगा। यह समय ही बताएगा कि नीरज का सोना हमारी सोच को बदलेगा या यह 2008 में बिंद्रा की उपलब्धि की तरह ही मात्र एक और फोटोऑप बनकर रह जाएगा?

लेखक दिल्ली में बसे वरिष्ठ खेल पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं।

–इंडिया न्यूज़ स्ट्रीम

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