गडकरी और शिवराज की संसदीय ने बोर्ड से छुट्टी, योगी को जगह नहीं, क्या है बीजेपी का संदेश?

बुधवार को बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पार्टी के नए संसदीय बोर्ड का गठन किया। कुल 11 सदस्यों वाले संसदीय बोर्ड से केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को बाहर कर दिया गया है। वहीं कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा और असम के पूर्व मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल को संसदीय बोर्ड में शामिल किया गया है। उत्तर प्रदेश में प्रचंड बहुमत से जीत हासिल घर के संसदीय बोर्ड में शामिल होने का दावा ठोकने वाली योगी आदित्यनाथ को निराशा हाथ लगी है बीजेपी ने संसदीय बोर्ड में एक भी मुख्यमंत्री को नहीं रखा। खेसरिया बोर्ड में बड़ा फेरबदल करके बीजेपी ने अहम संदेश देने की कोशिश की है।

संसदीय बोर्ड के साथ-साथ बीजेपी की चुनाव समिति का भी पुनर्गठन किया गया है। 15 सदस्यीय चुनाव समिति में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को शामिल किया गया है। पार्टी महासचिव बीएल संतोष को संसदीय बोर्ड का सचिव बनाया गया है। उन्हें चुनाव समिति में भी शामिल किया गया है। चुनाव की तैयारियों और रणनीति बनाने के लिहाज से बीजेपी में संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति को काफी अहम माना जाता है। पार्टी के इन दोनों ही महत्वपूर्ण अंगों के पुनर्गठन में कई नेताओं का कद घटा है तो कई का कद बढ़ा भी है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पिछले 8 साल से संसदीय बोर्ड के सदस्य थे। उन्हें बाहर का रास्ता दिखाने से निश्चित तौर पर पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व में उनका कद घटा है। वहीं केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को भी संसदीय बोर्ड से बाहर का रास्ता दिखाकर उनका कद घटाया गया है।

गडकरी को क्यों दिखाया गया संसदीय बोर्ड से बाहर का रास्ता?

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि हाल फिलहाल पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को लेकर परोक्ष रूप से दिए गए उनके कई बयानों के चलते उन्हें संसदीय बोर्ड से हटाया गया है। यह हैरान करने वाला फैसला है। गडकरी बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष हैं। परंपरागत रूप से पूर्व अध्यक्ष स्वतः ही संसदीय बोर्ड का हिस्सा रहे हैं। यह परंपरा पहली बात तब टूटी थी जब अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को संसदीय बोर्ड से हटाकर मार्गदर्शक मंडल में रखा गया था। मुरली मनोहर जोशी 80 साल की उम्र में पार्टी के पूर्व अध्यक्ष होने के बावजूद संसदीय बोर्ड से बाहर कर दिए गए थे लेकिन येदियुरप्पा को 79 साल की उम्र में लाया गया है। नितिन गडकरी को केवल 65 वर्ष की आयु में हटा दिया गया। जबकि पार्टी के एक और पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह 71 साल की उम्र में संसदीय बोर्ड में बने हुए हैं। खास बात है कि राजनाथ सिंह ने मोदी को पहली बार (2006-09) अध्यक्ष रहते हुए संसदीय बोर्ड से हटा दिया था।

क्या स्वतंत्र छवि का खामियाजा भुगता गडकरी ने ?

लगता है कि गडकरी को की अहम मुद्दों पर स्वतंत्र स्टैंड लेने और स्वतंत्र छवि बनाने का खामियाजा भुगतना पड़ा है। मुख्य रूप से तीन वजहों से गडकडी की स्वतंत्र छवि है।एक- उन्हें नागपुर में बैठे संघ नेतृत्व का पसंदीदा माना जाता है। नागपुर के एक ब्राह्मण, गडकरी पूरी तरह संघ के समर्थन के कारण 2009 में पार्टी अध्यक्ष बने थे। दूसरा- प्रमुख बुनियादी ढांचा वाले मंत्रालयों को संभालने वाले नितिन गडकडी ने की सरकार में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले मंत्री के रूप में अपनी छवि बनाई है। दूसरे कई मंत्रियों के विपरीत गडकरी पीएम ऑफिस से कुछ हद तक स्वायत्तता के साथ काम करते हैं। तीसरी और सबसे अहम यह है कि गडकरी ने अपनी उदारवादी छवि बनाई है। उन्होंने हमेशा सांप्रदायिक बयानों से परहेज किया है। दूसरी तरफ वो अपनी ही पार्टी की आलोचना वाले बयान देने के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में, उन्होंने एक टिप्पणी की थी कि गांधीजी के जमाने में राजनीति जन सेवा के लिए की जाती थी और आज सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिए राजनीति हो रही है। इससे पहले भी उन्होंने एक मराठी इंटरव्यू में मजाक में कहा था कि ”बीजेपी ने हर तरह के वादे किए क्योंकि उन्हें इतना बड़ा बहुमत मिलने की उम्मीद नहीं थी।”

क्या है बीजेपी संसदीय बोर्ड के अहम बदलाव?

बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को संसदीय बोर्ड से हटा दिया गया है। बोर्ड में शामिल किए गए नए सदस्यों में कर्नाटक के पूर्व CM बीएस येदियुरप्पा, पूर्व केंद्रीय मंत्री सत्यनारायण जटिया, असम के पूर्व मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल, तेलंगाना के नेता और बीजेपी के पिछड़ा मोर्चा के अध्यक्ष के। लक्ष्मण, बीजेपी पिछड़ा मोर्चा की पूर्व प्रभारी सुधा यादव और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष इकबाल सिंह लालपुरा शामिल हैं। सुषमा स्वराज, अरुण जेटली के निधन, एम वेंकैया नायडू के उप-राष्ट्रपति बनने और थावरचंद गहलोत को राज्यपाल बनाए जाने के कारण संसदीय बोर्ड में खाली पड़ी जगहों की वजह से यह फेर-बदल पिछले कुछ समय से लंबित था। लेकिन पीएम मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने दो नेताओं को हटाकर सिर्फ खाली पदों को नहीं भरा है बल्कि उससे आगे बढ़कर काम किया है।

बदलाव के पीछे क्या है मोदी-शाह की रणनीति?

संसदीय बोर्ड के फेरबदल पर स्पष्ट रूप से पीएम नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की मुहर लगी है। खास रणनीति रणनीति के तहत यह बड़ा फेरबदल किया गया है। यह विशेष रूप से नितिन गडकरी और शिवराज सिंह चौहान को बाहर करने के फैसले से स्पष्ट है। दोनों ही नेताओं ने मोदी-शाह की जोड़ी के बीजेपी में प्रभावी होने से पहले संसदीय बोर्ड में प्रवेश किया था। नितिन गडकरी और शिवराज सिंह चौहान को संसदीय बोर्ड से हटाना दरअसल उन नेताओं को दरकिनार करने का एक तरीका लगता है, जिनका कद पार्टी के शीर्ष दो नेताओं (मोदी-शाह) से स्वतंत्र है। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बोर्ड में शामिल न किए जाने के फैलने को भी इसी अर्थ में देखा जा रहा है। लगता है कि बीएस येदियुरप्पा को कर्नाटक में सीएम की कुर्सी के बदले मुआवजे के रूप में बोर्ड में जगह दिया गया है। यह अगले साल कर्नाटक में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले लिंगायत नेता को खुश रखने का एक स्पष्ट प्रयास लगता है। सर्बानंद सोनोवाल को भी असम में हेमंत बिस्वा सरमा के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने का इनाम दिया गया है। उनका शामिल होना नॉर्थ-ईस्ट को प्रतिनिधित्व देने पर पार्टी के फोकस का भी संकेत देता है।

क्या शिवराज के लिए है चिंता की बात?

शिवराज सिंह चौहान को 2013 में नरेंद्र मोदी के साथ संसदीय बोर्ड में शामिल किया गया था। 2011-12 की अवधि में, चौहान को अक्सर मोदी के प्रतिद्वंदी के रूप में पदोन्नत किया गया था। 2012 में बीजेपी की एक बैठक के दौरान, लालकृष्ण आडवाणी ने शिवराज चौहान के काम की तारीफ की थी। इसे मोदी के महत्व को कम करने के प्रयास के रूप में देखा गया। चौहान वर्तमान में एकमात्र बीजेपी सीएम हैं जो मोदी के पीएम बनने से पहले से सत्ता में हैं। बाकी सभी मोदी और शाह के आशीर्वाद से सीएम रहे हैं। मप्र में उनका आधार मोदी और शाह से स्वतंत्र है।उनके साथ शिवराज समीकरण थोड़ा मुश्किल रहा है। पहले एक उदारवादी के रूप में देखे जाने के बाद, वह ‘नई बीजेपी’ में वैधता हासिल करने के लिए मौजूदा कार्यकाल में ज्यादा हिंदुत्व समर्थक दिखने के लिए अपने रास्ते से हट गए हैं। मोदी और शाह अभी तक एक ऐसा नेता तैयार करने में नाकाम रहे हैं जो मध्य प्रदेश में चौहान की जगह ले सके। सांसद सत्यनारायण जाटिया को संसदीय बोर्ड में चौहान से थावरचंद गहलोत के विकल्प के तौर पर शामिल किया गया है।

संसदीय बोर्ड में क्यों नहीं लाए गए योगी?

योगी आदित्यनाथ मोदी और शाह के बाद बीजेपी में अब तक के सबसे लोकप्रिय नेता हैं। बीजेपी में उन्हे मोदी के बाद दूसरा सबसे लोकप्रिय नेता माना जाने लगा है। उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद से लगातार पार्टी में चर्चा थी कि संसदीय बोर्ड का सदस्य बनाकर योगी का कल बनाया जा सकता है। लेकिन उन्हें संसदीय बोर्ड में शामिल नहीं किया गया। जोगी ही क्या बीजेपी ने किसी भी मुख्यमंत्री को इस बार संसद में बोर्ड में जगह नहीं दी है। जो भी ठीक उसी तरह खुद को अगले प्रधानमंत्री के रूप में पूजन कर रहे हैं जैसे गुजरात का मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी ने 2012 का चुनाव जीतने के बाद किया था। शायद यही वजह है कि मोदी शाह की जोड़ी ने योगी को संसदीय बोर्ड से दूर रख कर यही संदेश देने की कोशिश की है कि फिलहाल वह यूपी ही संभाले तो बेहतर होगा।

फडणवीस का कद बढ़ाया

बीजेपी ने महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का भी कद बढ़ाया गया है। दरअसल, महाराष्ट्र में हुई सियासी उठापटक के बाद शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया गया था। जबकि, देंवेंद्र फडणवीस पहले इस राज्य के सीएम रह चुके थे। एकनाथ शिंदे के सीएम बनने के बाद फडणवीस ने कैबिनेट से भी बाहर रहने का ऐलान कर दिया था। हालांकि, बाद में केंद्रीय नेतृत्व के आदेश पर उन्होंने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। तब माना जा रहा था कि आलाकमान ने देवेंद्र फडणवीस ताकत घटा दिया है। अब भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति में उनको जगह देकर उनके कद को बढ़ाया गया है। इसी तरह पार्टी ने कर्नाटक में भी समीकरण साधने की कोशिश की है। कर्नाटक में कुछ समय पहले भाजपा ने येदियुरप्पा को सीएम पद से हटाया था। अब उन्हें केंद्रीय संसदीय बोर्ड में शामिल कर उनकी ताकत को बढ़ाया गया है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति के पुनर्गठन में पार्टी के लिए बेहतर काम करने वालों को इनाम दिया गया है। वहीं काफी दिनों से हाशिए पर चल रहे नताओं को फिर से मेनस्ट्रीम में लाकर उनकी नाराज़गी दूर करने की कोशिश की गई है। साथ ही उन्हें पार्टी में अपनी उपयोगिता साबित करने का एक और मौका दिया गया है। इस फेरबदल में मोटे तौर पर यही संदेश छिपा है।

————इंण्डिया न्यूज़ स्ट्रीम

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