अशोक वाजपेयी संस्कृति के रक्षक और प्रतिरोध के प्रतीक हैं-रोमिला थापर

तेरह खण्डों में अशोक वाजपेयी की रचनावली का लोकार्पण

नई दिल्ली। मोदी सरकार की असहिष्णुता के विरोध में पुरस्कार वापसी अभियान का नेतृत्व करने वाले हिंदी के प्रख्यात कवि आलोचक और संस्कृतिकर्मी अशोक बाजपाई की रचनावली का कल शाम यहां लोकार्पण किया गया।
इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के सभागार में हमारे समय के मशहूर बुद्धिजीवियों और चिंतकों ने 13 खण्डों में प्रकाशित इस रचनावली का लोकार्पण किया। इनमें अंतरराष्ट्रीय ख्याति के समाजशास्त्री आशीष नंदी, जानी मानी इतिहासकार रोमिला थापर, प्रसिद्ब कवि चित्रकार गुलाम मोहम्मद शेख, प्रसिद्ध भाषाविद गणेश देवी और दार्शनिक रोमिन जहाँ बेगलू शामिल थे।

श्रीमती थापर ने अशोक वाजपेयी को देश मे संस्कृति का रक्षक और पुरस्कार वापसी का प्रणेता बताते हुए उन्हें प्रतिरोध का लेखक कहा और उनके योगदान की चर्चा की। सभी वक्ताओं ने उन्हें देश मे सांस्कृतिक संस्थाओं के निर्माण में उनकी ऐतिहासिक भूमिका की चर्चा की।

करीब सात हजार पृष्ठों की इस रचनावली में अशोक वाजपेयी के करीब 60 वर्ष के रचनाकाल की सारी सामग्री है। इसमें कविता आलोचना, पत्र, आत्मवृत्त, स्तम्भ अनुवाद संस्मरण आदि शामिल हैं। इसमें अंग्रेजी में लिखे गए उनके लेखों को शामिल नहीं किया गया है। 1941 को दुर्ग में जन्मे अशोक वाजपेयी भारतीय प्रशासनिक सेवा के अवकाश प्राप्त अधिकारी हैं। 1966 में उनका पहला कविता संग्रह शहर अब भी संभावना प्रकाशित हुआ था।अब तक उनकी सौ पुस्तकें आ चुकी हैं जिनमें उनके बीस कविता संग्रह हैं।

वह भारत भवन के संस्थापक रहे हैं। ललित कला अकेडमी के अध्यक्ष और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्विद्यालय संस्थापक कुलपति भी रहे।
अशोक वाजपेयी की रचनवली का प्रकाशन हिंदी साहित्य एक अनोखी घटना है क्योंकि अब तक लेखकों के मरणोपरांत ही रचनावलियों के प्रकाशन की परंपरा रही है। आमतौर पर लेखकों के निधन के उपरांत ही उनकी रचनावलियाँ छपी हैं। खुद अशोक जी के ससुर एवम तारसप्तक के कवि एवम नाट्य आलोचक नेमिचन्द्र जैन की रचनावली भी उनके निधन के दो दशक बाद आई। हालांकि इसके कुछ विरल अपवाद भी हैं।

समारोह में आजादी के बाद रचनावली छपवाने का पहला उपक्रम प्रख्यात समाजवादी लेखक एवं स्वतंत्रता सेनानी रामबृक्ष बेनीपुरी ने किया था और उसके दो खण्ड निकले थे लेकिन वह अपनी योजना को पूरा नहीं कर पाए। अलबत्ता उनकी जन्मशती के मौके पर सुरेश शर्मा के संपादन में बेनीपुरी रचनावली निकली। हिंदी में रचनावली निकलने का दूसरा उपक्रम बिहार सरकार ने किया जब हिंदी गद्य के निर्माता आचार्य शिवपूजन सहाय बीमार पड़ गए तो उनकी आर्थिक मदद के लिए 4 खण्डों में उनकी रचनावली निकली क्योंकि शिवपूजन जी ने राज्य सरकार से आर्थिक मदद लेने से मना कर दिया था।इसके बाद सत्तर के दशक में मुक्तिबोध रचनावली से हिंदी में रचनावलियाँ निकालने की परंपरा शुरू हुई और उसके बाद से अनगिनत रचनावलियाँ निकली क्योंकि सरकारी खरीद में प्रकाशकों को रचनावलियों से कमाई होने लगी।

लेकिन गिने चुने लेखकों की ही जीते जी रचनावलियाँ निकलीं। हिंदी के लोकप्रिय कवि हरिवंश राय बच्चन की रचनवली भी उनके जीवन काल में प्रकाशित हुई थी और उसका लोकार्पण तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था और समारोह की अध्यक्षता नामवर सिंह की थी। दसेक साल पहले हिंदी के वरिष्ठ कवि रामदरश मिश्र की भी वली छपी थी। इस दृष्टि से देखा जाए तो अशोक जी की रचनावाली का आना हिंदी साहित्य में एक यादगार घटना की तरह है ।

श्री बाजपेई 1960 से लेकर अब तक साहित्य संस्कृति के मोर्चे पर लगातार सक्रिय रहे हैं और अब तो वह अपने आप में एक संस्था बन चुके हैं ।आजादी के बाद गिने चुने लेखकों ने हिंदी साहित्य का नेतृत्व किया। अशोक जी उनमें से एक हैं और 82 वर्ष की उम्र में युवा लेखकों को तराशने में लगे हैं। अशोक बाजपेई वैचारिक आग्रहों और अपनी कुलीन सौन्दर्याभिरूचि की वजह से विवादों के घेरे में भी रहे हैं लेकिन पिछले कुछ वर्षों से उनकी सक्रियता और जन पक्षधरता के नए आयाम भी सामने आए हैं। उन्होंने पुरस्कार वापसी और असहिष्णुता के मुद्दे पर हिंदी के लेखक समाज का नेतृत्व किया काबिले तारीफ है और उससे लोगों को नई प्रेरणा मिली है।

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