नई दिल्ली । गाने सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं होते, कभी-कभी ये आपके दिल में इस कदर उतर जाते हैं कि फिर उन्हें भूल पाना नामुमकिन हो जाता है। चाहे खुशियों का कोई पल हो या किसी दर्दभरी याद की कसक, कुछ गाने हर स्थिति में आपके दिल के करीब महसूस होते हैं। बॉलीवुड की दुनिया में ऐसे बहुत लोग हैं, जो सिर्फ गाने लिखते ही नहीं, बल्कि लोगों के दिलों की बातें भी गीतों में उतार देते हैं। ऐसे ही एक माटी से जुड़े हुए गीतकार थे भरत व्यास।
भरत व्यास, जो बॉलीवुड के पॉपुलर गीतकारों में गिने जाते हैं, वो सिर्फ शब्दों के जादूगर ही नहीं थे, बल्कि लोगों के जज्बातों को छू जाने वाले कलाकार भी थे। उनके गीतों में आपको सिर्फ प्यार या खुशी नहीं मिलेगी, बल्कि जिंदगी की छोटी-छोटी बातें, रिश्तों की नाजुकियत और कभी-कभी अधूरी ख्वाहिशें भी इतनी सरल भाषा में मिलती हैं कि लगे जैसे कोई आपके दिल की बात कर रहा हो।
भरत व्यास का जन्म 6 जनवरी 1918 को राजस्थान के बीकानेर में हुआ था। वे मूलरूप से चुरू जिले से थे। बचपन से ही उनमें कवि प्रतिभा दिखने लगी थी और सिर्फ 17-18 साल की उम्र तक आते-आते वे लिखने लगे थे। चुरू से मैट्रिक करने के बाद वे कलकत्ता चले गए, जहां उन्होंने अपनी लेखनी को और निखारा। उनका पहला लिखा गीत था ‘आओ वीरो हिलमिल गाए वंदे मातरम,’ और इसके अलावा उन्होंने ‘रामू चन्ना’ नामक नाटक भी लिखा।
1942 के बाद उन्होंने मुंबई का रुख किया। शुरू में उन्होंने कुछ फिल्मों में अभिनय किया और गाना भी गाया, लेकिन असली पहचान उन्हें गीत लेखन से मिली। हिंदी फिल्मों में उनका पहला बड़ा ब्रेक 1943 में रिलीज हुई फिल्म ‘दुहाई’ से आया। नूरजहां और शांता आप्टे जैसे कलाकारों ने उनके गीतों को आवाज दी। इसके बाद उनकी रचनाएं लगातार लोकप्रिय होती गईं।
भरत व्यास ने सिर्फ फिल्मी गीत ही नहीं लिखे, बल्कि नाटकों और रिकॉर्डिंग के लिए भी राजस्थानी गीत रचे। उनके गाने सरल और दिल को छू लेने वाले होते थे। चाहे सारंगा, नवरंग, रानी रूपमती या गूंज उठी शहनाई जैसी फिल्में हों, उनके गीतों के बोल हर पीढ़ी के दिल तक पहुंचे। आ लौट के आजा मीत, निर्बल से लडाई बलवान की, ऐ मालिक तेरे बंदे हम जैसे गीत आज भी याद किए जाते हैं।
उनकी लेखनी में एक खास बात यह थी कि वे आम इंसान की भावनाओं को भी बड़े सहज अंदाज में पेश कर देते थे। प्यार, दोस्ती, दर्द, उत्सव, हर भावना उनके गीतों में इतनी खूबसूरती से मिलती कि सुनने वाला खुद को उस कहानी का हिस्सा महसूस करता। यही वजह है कि उनके गीत समय की कसौटी पर खरे साबित हुए और आज भी अमर हैं।
भरत व्यास का जीवन भी उनके गीतों की तरह प्रेरक था। उन्होंने मुंबई में अपनी जड़ों से जुड़े रहकर काम किया और फिल्मों की चमक-दमक के बीच भी सादगी और सच्चाई बनाए रखी। उनके छोटे भाई बृजमोहन व्यास भी अभिनेता थे, लेकिन भरत व्यास की पहचान हमेशा गीतों से जुड़ी रही।
4 जुलाई 1982 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनके शब्द और गीत आज भी हमारे साथ हैं। उनके गाने न सिर्फ मनोरंजन करते हैं, बल्कि सोचने, महसूस करने और यादों में खो जाने का माध्यम हैं।
–आईएएनएस











