नई दिल्ली : सईद सोहरवर्दी उर्दू दुनिया के एक जाने-माने लेखक और वरिष्ठ कालमनिस्ट थे। लेकिन ज़्यादातर लोगों को यह बात नहीं मालूम है की वह एक बहुतअच्छे शायर भी थेI
उर्दू में जो उनकी शायरी की किताबें छप चुकी हें वह हैं:सुलगता संदल-1976; पंखड़ियां-1976 और संगरेज़े – 1976.
लेकिन उनकी ताज़ातरीन किताब ‘सईद सोहरवर्दी की शायरी-उर्दू और हिन्दी का संगम’ हिंदी में हैI और इसमें उनकी प्रकाशित और अप्रकाषित कवितायेँ दोनों शामिल हैंl सोहरवर्दी ने अपनी कविताओं में दोनो ज़बानों का इस्तेमाल किया है, क्यों उनका मानना था कि उर्दू के बिना हिन्दी अधूरी है और हिन्दी के बग़ैर उर्दू नामुकम्मल है।
उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। उनके गुज़र जाने पर कहा गया था कि उनके साथ उर्दू दुनिया का एक दौर ख़त्म हो गया।
‘सईद सोहरवर्दी की शायरी-उर्दू और हिन्दी का संगम‘ उनकी शायरी से चुनी गज़लों, नज़मो और गीतों का बहुत खूबसूरत संकलन हैं
आइये देखें उनके कलाम के कुछ नमूने जो इस किताब में शामिल हैंl
‘हम मिले, साथ रहे, आज अलग रहने लगे
तजुर्बा हम ने किया, कोई तमाशा तो नहीं!
उस ने बदली हैं निगाहें तो शिकायत क्यों हो
जिस को चाहा था उसे मैंने ख़रीदा तो नहीं!’
इस क़ते में, मोहब्बत को सईद सोहरवर्दी ने एक अलग रंग दिया है। आप को प्रेम, राजनिती, धर्म औरतौं के बारें में और अलग अलग ज़िन्दगी से जुड़े विषय, इनकी शायरी में नज़र आएंगे।
प्रेम, किसी की तरफ़ मोहब्बत सा एहसास के बारे में इन्होंने ख़ूब लिखा है, जो इन पंक्तियों में नज़र आता है–
ना जाने कौन सा तूफ़ान लेके आया है
वो एक क़तरा जो इस दिल के ज़ख़्म धोता है!
हज़ार मील का रस्ता है और कुछ भी नहीं
ये फ़ासला, जो निगाहों के बीच होता है!
-ये सोचा है काफ़ी के प्याले पे उस से
मोहब्बत की उलझन का इज़हार कर लूं?
पढ़ूं उस के गालों की सुर्ख़ी का मतलब
मिले गर इशारा तो इक प्यार कर लूं?
परिचय जब पहचान बना तो सुर में साधा सपनों को
इक बिन्दू ने रेखा बन कर घेर लिया है जीवन को
अपने चिंतन के शोलों से मुझ को युग का भरोसा मिला
मेरे सुर से ज्योत मिली है प्राण-प्रणय के दर्शन को
आपकी आँखो से शोख़ी की अदा सीखी थी
आप अब आँख दिखाएँ तो इसे क्या समझूँ?
आप ने प्यार से ‘बदमाश’ कहा था मुझको
इसको इल्ज़ाम कहूँ या कोई इनाम कहूँ?
आँखों में जिनकी मेरे लिये ख़्वाब थे सजे
क्यों आज मेरी आँखों से बचकर निकल गए
मोहब्बत में, शादी में है फ़र्क़ इतना
ये रिश्ता है दिल का, वो रिश्ता बदन का
अगर दोनों मिल जाएं है बात पूरी
नहीं तो अधूरा है ये खेल मन का!
नैनों में उस रूपवती के सपने मन की आशा के
झलकें, छलें, जैसे मुद्रा उस की चितवन में
इंद्रधनुष मिल जाए अगर तोड़ूं उस को राम करूं
मेरी सीता बन वो आए राज करे इस आंगन में
जलना पड़ेगा राम को भी उस की आंच में
सीता को आज़मा के सदाक़त की आग में
फूलों की गर्म राख का सदमा तो है मगर
पत्थर पिघल गए हैं मोहब्बत की आग में!
एक मासूम सी ख़्वाहिश मेरी रग-रग में रहा करती है
कोई लड़की मुझे देखे, मुझे चाहे, मुझे अपना कह दे!
सिर्फ़ इस बात पे मैं उस के लिए सर भी कटा सकता हूँ,
सब मुझे लाख बुरा कहते रहें वो मगर अच्छा कह दे!
बालकनी पर जब भी वो कंघी करने आती है
बालों को सुलझाती है, नज़रों को उलझाती है
जी चाहे मैं फूल बनूं, उस के बालों में बस जाऊं!
जोड़ा खोल
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औरतों की परेशानियां का भी कई तरह ये सामने लाऐं हैं। मसलन यह हैं, इन्की नज़्म ‘कालगर्ल’ की कुछ पंक्तियां-
कालगर्ल
रूप नगर के कितने गाहक
तेरा रूप चुराने आते
तेरा दर्द ना समझा कोई!
अपनी भूक मिटाने आते,
अपना रोग दिखाने आते,
तेरा रोग बढ़ाने आते
तेरा दर्द ना समझा कोई!
एक अलग बात कही गई है, कविता ‘सती सावित्री’ में । कुछ पंक्तियां इसकी-
चिता में मेरी बेबसी बेकली की
मेरे साथ कब से कोई जल रहा है?
वो सपना जो सिन्दूर की एक रेखा बना था
वो सपना मेरी आग में जल रहा है
वो इक नाम संगीत के रस में डूबा
मेरे नाम का एक हिस्सा बना था
मेरे टूटे तारों की फ़रियाद बनकर
मेरे बिखरे ख़्वाबों की इक याद बनकर
तड़प लेके जुगनू की आवारगी की
मेरे जलते दिल का धुआं बन गया है
यह बात, इन्हों ने कई बार लिखी और आज भी अहमियत रखती है -‘ईमानदारी और साहस को साहित्य में बढ़ावा देने की आवश्यक्ता पहले भी थी, आज भी है और भविष्य में भी रहेगी।’
शायद इसी वजह से, इनकी कविताओं में हालात के बदलते रंग के ख़िलाफ़ आवाज़ भी सुनाई देती है, जिसका उदाहरण यह हैं-
तोहफ़ों की क़ीमतों से नुमायां है अब ख़ुलूस,
जिन्स-ओ-वफा को बेच के बाज़ार खा गए
जज़्बात तोले जाते हैं ओहदों के बाट से
रिश्तों में कारोबार के अंदाज़ आ गए
- लीडर कहते काम करो! तुम काम करो!
पूछे कोई ये जाकर
बेकारी में मेहनत कर के कोई घर से खाता क्या? - ले गए सूद में ताजिर मेरा सरमाया-ए-जां
उस के जाने की शिकायत तो नहीं की मैंने
ज़िन्दगी! तेरे लिए जिस्म भी बेचा अक्सर
अपने ख़्वाबों की तिजारत तो नहीं की मैंने
ईरान की बातें करते हैं, तोरान की बातें करते हैं
मज़हब की दुहाई देते हैं, ईमान की बातें करते हैं
ये अपना नशा ये अपना जुनून कुछ और है शायद गुलशन में
वीरान-ए-गुलशन देख के हम इंसान की बातें करते हैं
- कहीं, कहीं मज़ाकिजया अंदाज़ भी झलकता है, मसलन-
वो फ़न की कद्रदां है मेरे ये तो ख़ूब है
जी चाहता है, उस से गुल तर की बात हो!
लेकिन ये अपने लोग उन्हें एक फ़िक्र है
बैंगन के भाव की या टमाटर की बात हो!
- दांत जब टूटे लगाए नक़ली
बाल काले कर के दिल को ख़ुश किया था!
फिर भी इक लड़की ने ‘अंकल’ कह दिया जब,
मुझ पे ये सुन कर भुड़ापा छा गया था!
सईद सोहरवर्दी का जन्म, 5 अगस्त, 1930, मिर्ज़ापूर, यूपी में हूआ था और दिल्ली में अधिक्तर रहे, जहां से 9 मार्च, 2017 को दुनिया को अलविदा कहा। पार्टीशन के वक्त, इन्के वालिद पाकिस्तान चले गए, इन्की मां, छोटी बहन और ये नहीं गए। यहां इस हौसले के साथ रहे, जो एक नज़्म में झलकता है-
‘जा चुकी जो रात, अब उस रात का मातम ना हो’
सोहरवर्दी साहब की किताबों में फिक्शन, उनकी लघु कथाओं का संकलन ‘लकीरेंऔर खाके’-1977, ‘कुछ फूल, कुछ पत्थर’-1988 और एक व्यंग्य ‘चुहे के खुतूत बिली के नाम’-1979 शामिल हैं। चूहे से बिल्ली तक)। आखिरी में व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करने वाली बिल्ली के हाथों एक आम आदमी (चूहे) की पीड़ा पर एक व्यंग है।
वह अपने पीछे एक दर्जन से अधिक पुस्तकों की विरासत छोड़ गए हैं। सुहरवर्दी साहब की पहली पुस्तक भारतीय मुसलमानों की आर्थिक समस्याओं और उनके समाधानों पर केंद्रित थी (मुसलमानों के इक्तेसादी मसाइल और उनका हाल-1975)। वह इस मुद्दे पर विचार करने वाले पहले व्यक्ति थे। आपातकाल के दौर में, ‘संग्रेज़े’ प्रकाशित होने वाली एकमात्र उर्दू किताब थी, जिसमें सुहरवर्दी साहब ने अपने छंदों के माध्यम से इस अवधि की कड़ी आलोचना की थी। उनके व्यक्तित्व का एक मजबूत बिंदु अपने बल पर आगे बढ़ना था। उन्होंने मुशायरों में भाग नहीं लेने का भी फैसला कियाl
उनका वास्तविक नाम सैयद सईद-उल-हक सुहरवर्दी था। उन्होंने सईद सोहरवर्दी को अपने कलमी नाम के रूप में इस्तेमाल किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान, उन्होंने उस दौर की एक मशहूर राष्ट्रवादी मासिक पत्रिका, नई जिंदगी, जिसको स्वतंत्रता सेनानी सैयद अनीसुर रहमान निकलते थे के लिए काम किया और उसी के ज़र्ये पत्रकारिता की दुनिया में आगे बढ़े। करियर के लिहाज से और शिक्षा की खोज में सोहरवर्दी साहब शुरू से अपनी ही मेहनत के दम पर आगे बढ़े बिना किसी की सिफारिश और सहारे के।
इलाहाबाद की उनकी पोषित यादों में उनके साले, स्वर्गीय बशीर अहमद (एक वकील और सांसद), उनके दोस्तों के हल्क़ा, जिनमें धीरेंद्र वर्मा, सुरेश श्रीवास्तव, महेश लाल और दिवंगत प्रधान मंत्री चंद्रशेखर शामिल,के साथ उनका गुज़ारा हुआ वक़्त हैI चंद्रशेखर, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उनके वरिष्ठ थेI
—इंडिया न्यूज़ स्ट्रीम











