महाराष्ट्र : पहली महिला दलित आत्मकथाकार शांताबाई के. कांबले का 99 की उम्र में निधन

पुणे:प्रख्यात लेखिका शांताबाई कृष्णाजी कांबले, जिन्हें पहली महिला दलित आत्मकथाकार के रूप में जाना जाता है, का यहां बुधवार सुबह 99 साल की उम्र में निधन हो गया। उनके एक पारिवारिक मित्र ने यह जानकारी दी।

वह वृद्धावस्था संबंधी बीमारियों से पीड़ित थीं। उनका अंतिम संस्कार आज शाम कोपरखैरने श्मशान घाट में किया जाएगा।

दिवंगत प्रोफेसर अरुण कांबले की मां, भारत के दलित पैंथर्स पार्टी के संस्थापक-सदस्य और राजनीतिज्ञ, शांताबाई के परिवार में उनके पोते और परपोते हैं।

शीर्ष दलित हस्तियों ने शांताबाई को श्रद्धांजलि अर्पित की और याद किया कि डॉ. बी. आर. अम्बेडकर के संविधान द्वारा भारत में शिक्षा का सार्वभौमिक अधिकार दिए जाने के बाद कैसे उनके जीवन के संघर्षो के लेखन ने दलित साहित्य में एक खाली जगह को भरने में मदद की।

दलित इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (डीआईसीसीआई) के अध्यक्ष और लेखिका के करीबी पारिवारिक मित्र मिलिंद कांबले ने कहा, “इसके बाद कई महिलाएं शिक्षित हुईं, कुछ ने लिखना भी शुरू किया, लेकिन शांताबाई ने कमजोर वर्ग और दलितों को एक मजबूत आवाज देने की नींव रखी। दलित साहित्य में उनके अपार योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता है।”

मार्च 1983 में 60 वर्षीय सेवानिवृत्त सरकारी स्कूल शिक्षिका शांताबाई ने मराठी में अपनी आत्मकथा ‘माज्य जलमाची चित्रकथा’ लिखना शुरू किया, जिसे ‘पूर्वा’ पत्रिका में लेखों की एक श्रृंखला के रूप में प्रकाशित किया गया था।

श्रृंखला ने लोकप्रिय कल्पना को पकड़ा और जून 1986 में यह एक पुस्तक के रूप में सामने आया, बाद में इसे दूरदर्शन मराठी के लिए ‘नजुका’ (अगस्त 1990 के बाद) के रूप में एक टेली-धारावाहिक बनाया गया।

जैसे-जैसे लोकप्रियता बढ़ी, लेखिका ने वैश्विक दर्शकों के लिए आत्मकथा का बाद में हिंदी और अन्य भाषाओं में अनुवाद किया, साथ ही अंग्रेजी और फ्रेंच (‘द केलीस्डोस्कोप स्टोरी ऑफ माय लाइफ’) और कुछ अध्याय ‘फेमिना’ पत्रिका में प्रकाशित किए गए।

आत्मकथा को मुंबई मराठी साहित्य विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम के भाग के रूप में भी निर्धारित किया गया है, जहां उनके दिवंगत बेटे ने एक बार मराठी विभाग के प्रमुख के रूप में कार्य किया था और वर्षो बाद एक एनिमेटेड संस्करण भी ‘नाजा गोज टू स्कूल’ के रूप में सामने आया।

एक ‘अछूत’ लड़की के रूप में अपने स्वयं के अनुभवों को याद करते हुए सोलापुर में एक गरीब परिवार में पैदा हुई, नाजा सखाराम बाबर (शादी के बाद नया नाम शांताबाई रखा गया), आत्मकथा में ऊंची जातियों द्वारा दलितों का उत्पीड़न किए जाने की चर्चा की गई है।

इसके अलावा, उन्होंने अपने लेखन में समुदाय के भीतर पुरुष-प्रधान समाज में बड़े पैमाने पर हुए ‘लैंगिक भेदभाव’ पर भी कड़ा प्रहार किया।

शांताबाई ने अपने जीवन की मर्मस्पर्शी कहानी अपने मजदूर आई-अप्पा (माता-पिता) को समर्पित की, जो भूखे पेट दिनभर काम करते थे। फिर भी उन्होंने अपनी बेटी (नाजा) को शिक्षित करने का संकल्प लिया, ताकि वह अंधेरे से उजाले की ओर जाए।

असाधारण रूप से प्रतिभाशाली और मेधावी लड़की, शांताबाई की आत्मकथा में उल्लेख किया गया है कि उन्हें (नाजा) किताबें, कागज, स्याही खरीदने के लिए प्रति माह 3 रुपये की सरकारी छात्रवृत्ति मिलती थी, क्योंकि वह शुरू में स्कूल जाने वाली एकमात्र लड़की थी।

लेकिन ‘अछूत’ माने जाने के कारण स्कूल में भी उन्हें प्रताड़ित किया, अन्य छात्रों के साथ बैठने से रोक दिया गया था, और अपमानित किया गया था और कक्षा के बाहर बैठने के लिए मजबूर किया गया था।

उनके जीवन में एक और विडंबनापूर्ण मोड़ आया, जनवरी 1942 में जब देश स्वतंत्रता की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा था, शांताबाई ब्रिटिश शासन के दौरान सोलापुर जिला स्कूल बोर्ड में नियुक्त होने वाली पहली दलित शिक्षिका बनीं।

लगभग दस साल बाद उन्होंने पुणे महिला कॉलेज में अपना प्रशिक्षण पूरा किया और कुछ समय के लिए सांगली में शिक्षा विस्तार अधिकारी के रूप में काम किया।

सन् 1942 में वह अपने पति कृष्णाजी कांबले के साथ डॉ. अम्बेडकर से मिले और उनके दलित आंदोलन में शामिल हुए। 1957 में वह दलित वर्ग के हजारों लोगों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण किया था।

इन वर्षो में वह डॉ. अंबेडकर, विठ्ठल रामजी शिंदे और अन्य दलित आइकन के साथ निकटता से जुड़ीं।

केंद्रीय सामाजिक न्याय राज्यमंत्री रामदास अठावले, कई प्रमुख दलित नेताओं और अन्य लोगों के आज शाम शांताबाई के अंतिम संस्कार में आने की उम्मीद है।

–आईएएनएस

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