डेविड स्जेले को मिला बुकर प्राइज, क्यों जूरी ने माना ‘फ्लेश’ है ‘सिंगुलर अचीवमेंट’

नई दिल्ली । लंदन में आयोजित बुकर प्राइज 2025 समारोह में डेविड शजाले की नई उपन्यास फ्लेश को वह सम्मान मिला जिसकी अवहेलना करना मुश्किल था। जूरी ने इसे “सिंगुलर अचीवमेंट” (विलक्षण उपलब्धि) कहा—एक ऐसा उपन्यास जिसे, उनके शब्दों में, उन्होंने “पहले कभी नहीं पढ़ा।” फ्लेश को यह विशिष्ट स्थान सिर्फ उसके विषयों के कारण नहीं, बल्कि उसकी अनोखी शैली, उसकी चुप्पियों, और उसके पात्र ‘इस्तवां’ की उस मौजूदगी से मिला जो पन्नों के बीच होते हुए भी अज्ञात बनी रहती है।

कहानी का नायक इस्तवां हंगरी की श्रमिक-कालोनियों में पला, फिर बेहतर जीवन की तलाश में ब्रिटेन पहुंचा और वहां एक ऐसी दुनिया में खुद को पाता है जहां वर्ग, शरीर, श्रम और अस्तित्व एक-दूसरे में उलझते हुए उसकी पहचान को लगातार बदलते रहते हैं। कहानी किसी बड़े प्लॉट या भावनात्मक चढ़ाव-उतार के बजाय छोटे, लगभग बोले न जाने वाले पलों से बनती है—वही पल जो एक आदमी के मन, उसके काम, उसकी इच्छाओं और उसकी असफलताओं को असल रूप में सामने लाते हैं।

संवाद छोटे हैं—“ओके” और “आई डोंट नो”—जैसे वाक्य, जिनके पीछे छिपी हुई थकान, दूरी और असहायता खुद पाठक पर उतर आती है। बुकर प्राइज जूरी ने इसी संक्षिप्त वाक्यांश को इसकी सबसे बड़ी ताकत बताया, क्योंकि लेखक ने भाषा को जटिल बनाए बिना एक ऐसे जीवन की परतें खोली हैं जिसे साहित्य में अक्सर जगह नहीं मिलती। यह पुरुषत्व के उस रूप की खोज है जो न तो नायकत्व से भरा है, न नैतिकता के बड़े भाषणों से बल्कि रोज़ के संघर्ष, शरीर की सीमाओं, काम की कठोरता और अपनेपन की तलाश से बना है।

आयोजकों ने इसे “क्लास, पावर (सत्ता), इंटीमेसी (आत्मीयता), माइग्रेशन (प्रवासन), और मैस्कुलेनिटी (पुरुषत्व) पर एक गहरा मेडिटेशन (ध्यान)” बताया—एक ऐसी यात्रा जो एक इंसान के उन अनुभवों को पकड़ती है जो जीवन के दशकों में भीतर ही भीतर गूंजते रहते हैं। लंदन के ओल्ड बिलिंग्सगेट में मंच पर पुरस्कार स्वीकार करते हुए स्जेले ने कहा कि उनकी यह किताब “एक जोखिम” थी। उन्होंने मुस्कुराते हुए याद किया कि कभी उन्होंने अपनी संपादक से पूछा था, “क्या आप कल्पना कर सकती हैं कि ‘फ्लेश’ नाम की किताब बुकर प्राइज जीत सकती है?” और फिर उन्होंने खुद ही (मंच से पुरस्कार प्राप्त करते हुए) जवाब दिया—”अब आपको जवाब मिल गया।”

लेकिन फ्लेश की सबसे बड़ी ताकत वह है जिसे जजों के चेयर रॉडी डॉयले ने अपने बयान में विश्लेषित किया। डॉयले ने बताया कि छह शॉर्टलिस्टेड पुस्तकों पर पांच घंटे की चर्चा के बाद भी जूरी बार-बार फ्लेश पर लौटती रही क्योंकि वह बाकी सबसे अलग थी—“हमने इससे पहले ऐसी कोई चीज नहीं पढ़ी थी।” उन्होंने कहा कि यह उपन्यास कई तरीकों से “डार्क” है, मगर उसे पढ़ना एक आनंद है, एक ऐसा अनुभव जो पाठक को पन्ना पलटते समय जीवित होने का एहसास कराता है।

डॉयले ने इस बात पर विशेष ध्यान दिलाया कि उपन्यास किस तरह सफेद खाली जगह (व्हाइट स्पेस) का इस्तेमाल करता है। इस्तवां के बारे में पाठक जानता है, पर वह कैसा दिखता है, यह कभी स्पष्ट नहीं होता; और फिर भी यह कोई कमी महसूस नहीं होती। वह एक उम्र में गंजेपन की तरफ जाता दिखता है क्योंकि वह दूसरे आदमी के बालों को ईर्ष्या के साथ देखता है; वह दुख में डूबा है, यह इसलिए पता चलता है क्योंकि पन्नों पर कई पंक्तियों तक शब्द ही नहीं हैं। इन खाली जगहों ने जूरी को प्रभावित किया, क्योंकि इन्हीं के बीच लेखक पाठकों को आमंत्रित करता है कि वे खुद इस पात्र को पूरा करें—मानो इस्तवान उनके साथ मिलकर बन रहा हो।

साधारण, संयत और किफायती भाषा के साथ लिखी गई यह कहानी हर शब्द का वजन महसूस कराती है। डॉयले ने कहा, “हर शब्द मायने रखता है; शब्दों के बीच की जगह भी मायने रखती है।” फ्लेश जीवन के अनोखेपन और उसके प्रवाह को इस तरह पकड़ता है कि पाठक खुद को उसी अनुभव का हिस्सा पाता है, जैसे वह किसी निजी, गूंजती हुई याद में प्रवेश कर गया हो।

इसी विशिष्टता ने फ्लेश को इस साल का बुकर प्राइज दिलाया—एक ऐसी किताब जो न सिर्फ अपने पात्र के भीतर उतरती है, बल्कि पाठक को भी उसके साथ बदलने पर मजबूर कर देती है। यह उपन्यास अपने समय की उन दुर्लभ साहित्यिक कृतियों में से एक है जिनके पन्नों में जितना लिखा है, उतना ही अनलिखा भी, और शायद वहीं उसका जादू है।

–आईएएनएस

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