रांची, 30 जनवरी (आईएएनएस)| झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन यानी जेपीएससी ने अनूठा रिकॉर्ड बनाया है। राज्य में सरकारी सेवाओं में नियुक्तियों के लिए जिम्मेदार इस सर्वोच्च संस्था की स्थापना राज्य बनने के दो साल बाद 2002 में हुई थी। बीते बीस सालों में इस संस्था ने नौकरियों के लिए जितनी परीक्षाएं आयोजित की हैं, उससे कई गुणा ज्यादा इसने विवाद पैदा किये हैं। इसके दामन पर भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों के बेहिसाब आरोप चस्पां हैं।
जेपीएससी की ओर से ली गयीं 16 परीक्षाएं सीबीआई जांच के दायरे में हैं। इसके चेयरमैन से लेकर सदस्यों तक को जेल यात्राएं करनी पड़ी हैं। परीक्षाओं में गड़बड़ियों और विवादों को लेकर तकरीबन पांच दर्जन से मुकदमे अदालतों में चल रहे हैं। झारखंड हाईकोर्ट ने 2021 से लेकर अब तक कोई दर्जन बार जेपीएससी के खिलाफ सख्त टिप्पणियां की हैं। सबसे ताजा विवाद पिछले साल ली गयी सिविल सर्विस की प्रारंभिक परीक्षा को लेकर है, जिसे लेकर अदालत में कई तारीखों में हुई सुनवाई के बाद बीते 25 जनवरी को जेपीएससी ने खुद मान लिया कि रिजल्ट निकालने में गड़बड़ी हुई है। अदालत कोई आदेश जारी करता, उसके पहले इसने गलती मानते हुए रिजल्ट को नये सिरे से जारी करने के लिए मोहलत मांग ली है।
जेपीएससी ने राज्य सिविल सेवा के 7 से 10वें बैच तक की परीक्षा एक साथ लेने का विज्ञापन पिछले साल निकाला था। 19 सितंबर 2021 को प्रारंभिक परीक्षा ली गयी, जिसमें दो लाख 49 हजार 650 उम्मीदवार शामिल हुए। परीक्षा लेने के 42वें दिन रिजल्ट निकाल दिया गया। दावा किया गया कि पहली बार रिकॉर्ड समय में रिजल्ट निकालकर जेपीएससी ने रिकॉर्ड बनाया है, लेकिन हकीकत में इसने गड़बड़ियों के पुराने रिकॉर्ड को एक बार फिर बरकरार रखा। रिजल्ट निकलने के साथ ही गड़बड़ियां और विवाद सामने आने लगे। परीक्षा कुल 1102 केंद्रों पर हुई थी, लेकिन इनमें से सिर्फ दो-तीन खास केंद्रों पर परीक्षा देनेवाले लगातार रोल नंबर वाले तीन दर्जन परीक्षार्थियों को उत्तीर्ण घोषित किया गया था। सवाल उठा कि ऐसा कैसे हो सकता है कि इतने सारे मेधावी छात्र एक ही परीक्षा केंद्र पर परीक्षा दे रहे थे! वो भी लगातार रोल नंबर वाले ! इसी तरह आरक्षण नियमों का पालन न होने, कटऑफ जारी न किये जाने सहित कई तरह की गड़बड़ियों पर सवाल उठे।
राज्यपाल रमेश बैस ने ऐसी शिकायतों पर संज्ञान लेकर जेपीएससी चेयरमैन अमिताभ चौधरी को राजभवन तलब किया। लेकिन जेपीएससी ने गड़बड़ियों के तमाम आरोपों को सिरे से नकार दिया। उसने अपनी ऑफिशियल वेबसाइट पर भी गड़बड़ियों का खंडन किया। आयोग के चेयरमैन अमिताभ चौधरी ने लगातार रोल नंबर वाले परीक्षार्थियों की सफलता को महज संयोग बताया। हालांकि कुछ रोज बाद जेपीएससी ने रिवाइज रिजल्ट जारी कर सफल घोषित 49 परीक्षार्थियों को फेल करार दिया।
रिजल्ट की गड़बड़ियों को लेकर छात्रों ने रांची में कई दिनों तक बवाल किया। जेपीएससी मुख्यालय का घेराव हुआ। प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की लाठियां भी बरसीं। आखिरकार उम्मीदवारों ने झारखंड हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कीं। कई तारीखों में सुनवाई हुई। इन विवादों और मुकदमों के बीच ही जेपीएससी ने 28 जनवरी से मुख्य परीक्षा लेने का कार्यक्रम भी जारी कर दिया। अदालत ने गड़बड़ी के आरोपों वाले बिंदुओं पर जेपीएससी को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था, लेकिन 25 जनवरी को आयोग ने स्वयं प्रारंभिक परीक्षा के रिजल्ट में नियमों का पालन न होने की बात स्वीकार करते मुख्य परीक्षा का स्थगित करने की जानकारी अदालत को दी। जाहिर है, पहले ही चरण में विवादों में फंसी इस परीक्षा की प्रक्रिया कब पूरी होगी और अंतिम तौर पर नियुक्तियां कब तक हो पायेंगी, इसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है।
जेपीएससी की स्थापना के साथ ही गड़बड़ियों के दाग उसके दामन पर चिपकते रहे। जेपीएससी ने आखिरी सिविल सर्विस परीक्षा 2016 में ली थी। बीते छह सालों में वह एक भी सिविल सर्विस परीक्षा आयोजित नहीं कर पायी, जबकि कायदे से सिविल सर्विस की परीक्षा हर साल लिये जाने का प्रावधान है। 2016 की सिविल सर्विस परीक्षा भी हर चरण में विवादों से गुजरी और इसके अंतिम रिजल्ट के आधार पर हुई नियुक्तियों में भी गड़बड़ी का आरोप है और इससे जुड़ा मुकदमा अभी भी कोर्ट में चल रहा है। छठी सिविल सर्विस में भी प्रारंभिक परीक्षा का रिजल्ट तीन बार संशोधित हुआ था। प्रारंभिक परीक्षा का रिजल्ट आने में करीब 360 दिन लगे थे और आखिरी साक्षात्कार के बाद नियुक्तियों में करीब साढ़े चार साल का वक्त गुजर गया।
जेपीएससी ने20 सालों में 1292 पदों के लिएसिविल सर्विस की कुल साढ़े छह परीक्षाएं लीं हैं। साढ़े छह कहने का आशय यह है कि तमाम विवादों के बावजूद छह परीक्षाओं के आधार पर नियुक्तियां की जा चुकी हैं और सातवीं सिविल सेवा की परीक्षा पहले ही चरण में नये तरह के विवाद में फंसकर अटक गयी है। पहली सिविल सेवा परीक्षा में 64, दूसरी में 172, तीसरी में 242, चौथी में 219, पांचवीं में 269 और छठी सिविल सेवा परीक्षा में 326 पदों पर नियुक्ति हुई। छह परीक्षाओं लेकर में 54 मामले कोर्ट में चल रहे हैं, जबकि सातवीं परीक्षा को लेकर भी चार-पांच याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है।
थोड़ा पीछे चलें तो जेपीएससी ने पहली सिविल सर्विस परीक्षा 2003 में ली थी। 64 पदों के लिए हुई परीक्षा के जरिए नियुक्ति में भ्रष्टाचार के आरोप लगे। ऐसे लोग भी अधिकारी बन गए जिनके आंसरशीट की जांच ही नहीं हुई थी। आंसरशीट में परीक्षक के हस्ताक्षर का न होना, ओवर राइटिंग आदि की बात भी सामने आई। मामले ने तूल पकड़ा, तो फॉरेंसिक जांचहुई। तत्कालीन राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी ने पूरे मामले की इन्क्वायरी विजिलेंस को सौंपी। गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार के आरोपों में जेपीएससी के तत्कालीन दिलीप प्रसाद, सचिव सहित इसके सभी सदस्यों को जेल जाना पड़ा। हाईकोर्ट ने नियुक्तियां रद्द कर दीं। जांच का जि़म्मा सीबीआई को सौंपा गया। हालांकि बाद में सर्वोच्च सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश पर स्टे लगा दिया और मामले की सुनवाई होने तक सभी नियुक्त लोगों को कार्य करने की अनुमति प्रदान कर दी।
2005 में सेकेंड सिविल सर्विस परीक्षा ली गई। इस बार 172 पदों के लिए नियुक्ति का विज्ञापन निकाला गया। लेकिन 165 लोगों की नियुक्ति विवादित मानी गयी। इसपर भी सीबीआई की जांच चल रही है। तीसरी सिविल सेवा परीक्षा में भी अनियमितता के आरोप लगे। चौथी जेपीएससी में प्रारम्भिक परीक्षा में सवालों की गड़बडियों सामने आयीं। आयोग के मॉडल उत्तर में भी कई खामियां रहीं। खुद आयोग के एग्जामिनेशन कंट्रोलर ने ही पीटी परीक्षा को रद्द करने की अनुशंसा की। पांचवीं जेपीएससी में आरक्षण के मुद्दे पर आयोग विवादों में फंसा। सिविल सर्विस से इतर आयोग द्वारा लेक्च रर नियुक्ति को लेकर भी कई विवाद हैं। इसकी गड़बड़ियों की भी सीबीआई जांच चल रही है। कुल 16 परीक्षाएं ऐसी हैं, जो सीबीआई जांच के दायरे में हैं।
राज्य में सरकारी नौकरियां देनेवाली इस सर्वोच्च संस्था का यह हाल तब है, जब राज्य में बेरोजगारों की बड़ी फौज खड़ी है। राज्य के सभी 43 इम्प्लॉयमेंट एक्सचेंजों में पिछले जून तक रजिस्टर्ड बेरोजगारों की संख्या छह लाख 45 हजार 844 थी। राज्य में सरकारी विभागों में कुल रिक्त पदों की संख्या लगभग साढ़े तीन लाख है। वर्ष 2021 को राज्य सरकार ने नियुक्ति वर्ष घोषित किया था, लेकिन पूरे साल में सरकार में हुई तमाम नियुक्तियों की संख्या एक हजार भी नहीं पहुंच पायी।
राज्य के विनोबा भावे विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ एससी शर्मा कहते हैं कि ” राज्य में अब तक 20 सिविल सेवा की परीक्षाएं हो जानी चाहिए थीं। आयोग हर साल में परीक्षाएं लेने में नाकाम रहा है और नियुक्तियों का बैकलॉग बढ़ता जा रहा है।”
वरिष्ठ पत्रकार सुधीर पाल कहते हैं कि ” जेपीएससी जैसी नियुक्ति प्रदाता संस्थाओं पर नये झारखंड के लिए प्रतिभासंपन्न मानव संसाधन गढ़ने की जिम्मेदारी थी, लेकिन पिछले दो दशकों में इन संस्थाओं का ट्रेंड उनकी स्थापना के उद्देश्यों के बिल्कुल उलट रहा। जब तक सरकार ²ढ़ इच्छाशक्ति के साथ इन संस्थाओं की जिम्मेदारी तय नहीं करती, तब तक राज्य के बेरोजगारों की उम्मीदें इसी तरह कुचली जाती रहेंगी।”
–आईएएनएस











