बिहार के लॉट साहब यानी राज्यपाल फागू चौहान संकट में हैं. उनके बनाए कई वाइस चांसलरों पर भ्रष्टचार के गंभीर आरोप लग रहे हैं. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इससे खासे नाराज हैं. राज्य में भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने का भरोसा दिलाने वाले नीतीश कुमार के राज में युनिवर्सिटी भ्रष्टाचार का अड्डा बन जाएं तो उनकी भवें तो तनेंगी ही. इससे सरकार और राजभवन में टकराव भी बढ़ा है. बिहार सरकार ने न सिर्फ अपनी नाराजगी जताई बल्कि राजभवन तक कड़ा संदेश भी पहुंचाया है. बिहार सरकार ने कुछ मामलों में जांच की सिफारिश कर राज्यपाल का संकट और बढ़ा दिया है.
भ्रष्टाचार के मामले उजागर होने के बाद दिल्ली भी राज्यपाल से नाराज बताई जा रही है और केंद्र सरकार ने उन्हें तलब भी किया. वे भागे-भागे दिल्ली पहुंचे. सफाई भी दी है लेकिन सफाई गले नहीं उतर रही है. पत्रकारों से भी जिस तरह से उन्होंने बात की उससे भी उनकी परेशानी का पता चलता है. पत्रकारों ने जब उनसे घोटालों पर सवाल किया तो वे सवालों से बचते हुए दिखाई दिए और सिर्फ इतना कहा कि आरोप लगाने वालों से सवाल करें. उनके चेहरे पर जो इबारत लिखी थी उससे साफ पता चल रहा था कि मामला कहीं ज्यादा गंभीर है. राज्यपाल ने ही सारी नियुक्तियां की थीं, इसलिए वे सवालों में है. सियासी हलकों में चर्चा इस बात की है कि भ्रष्टाचार के तार राजभवन से सीधे जुड़े हैं.
बिहार में करीब आधा दर्जन यूनवर्सिटी में घोटाले के मामले सामने आए. वाइस चांसलर (वीसी) और रजिस्ट्रार सहित दूसरे कर्मचारियों की मिलीभगत से करोड़ों की लूट हुई. कहा यह भी जारहा है कि इसकी शिकायत कई बार राजभवन से भी की गई लेकिन राज्यपाल ने इसे अनदेखा किया. इतना ही नहीं अपने चहेते एक वीसी को तो राज्यपाल फागू चौहान ने हफ्ते भर पहले सर्वश्रेष्ठ वीसी का चांसलर अवार्ड देकर सम्मानित भी किया था. ये वीसी महोदय राज्यपाल के खास बताए जाते हैं. वीसी के खिलाफ गंभीर आरोप लगे थे लेकिन उन्हें सम्मानित कर डाला गया. इस सम्मान समारोह से नीतीश कुमार ने इन वजहों से ही किनारा कर लिया था.
भ्रष्ट्चार के मामले सामने आने के बाद केंद्र सरकार ने फागू चौहान को दिल्ली तलब किया. फागू चौहान केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से मिले. माना जा रहा है कि धर्मेंद्र प्रधान ने राज्यपाल फागू चौहान के सामने बिहार के विश्वविद्यालयों में घोटालों की लंबी सूची रखी और उनसे बहुत ही तल्ख लहजे में पूछा कि बिहार की युनिवर्सिटियों में क्या चल रहा है. भ्रष्टाचार की आंच आपके दामन तक भी पहुंच रही है. नीतीश सरकार ने भ्रष्टाचार की सारी फाइनल केंद्र सरकार तक पहुंचा दी थी. उस फाइल में एक-एक जानकारी दी गई है. मामला गंभीर है और राज्यपाल पर आरोप लगने का मतलब है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर आरोप लगना. मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्यपाल को दिल्ली तलब किया गया था.
राजभवन की मेहरबानी से एक साथ चार-चार यूनिवर्सिटी के कुलपति की कुर्सी संभालने वाले सुरेंद्र प्रताप सिंह से लेकर मगध विश्वविद्यालय के वीसी राजेंद्र प्रसाद के काले कारनामों की पूरी सूची प्रधान के पास थी. सूत्र बताते हैं कि धर्मेंद्र प्रधान ने राज्यपाल से पूछा कि भ्रष्टाचार के गंभीर मामले सामने आने के बावजूद वे चुप क्यों रहे. ऐसा कहा जा रहा है कि भ्रष्टाचार के तार राजभवन से जुड़े होने के दस्तावेज भी केंद्र सरकार के पास है. फागू चौहान को सारे कागजात दिखाए गए.
बिहार सरकार के निगरानी विभाग के छापों में ऐसे फर्जीवाड़े पकड़े गए जिससे बिहार सरकार दंग है. लेकिन राज्यपाल पर उसका कोई असर नहीं दिखा. भ्रष्टाचार के मामले सामने आने के बावजूद 23 नवंबर को राजभवन में चांसलर अवार्ड समारोह में श्रेष्ठ कुलपति के तौर पर ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति सुरेंद्र प्रसाद सिंह को सम्मानित किया गया. राजभवन ने यह सम्मान उसी दिन दिया जिस दिन सुरेंद्र प्रसाद सिंह की कारगुजारियां सामने आईं थीं और जिसे सुन कर बिहार का शिक्षा जगत हैरानी और सकते में थे. मीडिया में सुरेंद्र प्रसाद सिंह के भ्रष्टाचार की चर्चा हो रही थी लेकिन राजभवन ने तमाम आरोपों को दरकिनार कर सुरेंद्र प्रसाद सिंह को सम्मानित किया. इससे ही राज्यपाल और उनके रिश्तों को समझा जा सकता है. इस सम्मान समारोह का बिहार सरकार ने बॉयकाट भी किया. समारोह में बिहार सरकार के शिक्षा मंत्री विजय चौधरी और शिक्षा विभाग के अधिकारियों को हिस्सा लेना था. लेकिन बिहार सरकार की नाराजगी के बावजूद राजभवन पर इसका असर नहीं हुआ.
राज्यपाल की अपनी सफाई हो सकती है लेकिन सच तो यह है कि मिथिला यूनिवर्सिटी के वीसी सुरेंद्र प्रसाद सिंह को राज्यपाल के श्रेष्ठ कुलपति का सम्मान देने से पहले ही सुरेंद्र प्रसाद सिंह के काले कारनामे बाहर आचुके थे. मामला पटना के मौलाना मजहरुल हक अरबी फारसी विश्वविद्यालय के वीसी प्रोफेसर कुद्दूस के पत्र से सामने आया. मोहम्मद कुद्दूस ने यूनिवर्सिटी के प्रभारी वीसी रहे सुरेंद्र प्रसाद सिंह के कारनामों को लेकर नीतीश कुमार को पत्र लिखा था. सुरेंद्र प्रसाद सिंह फिलहाल ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी के वीसी हैं लेकिन कुछ महीने पहले तक वे अरबी फारसी विवि के भी प्रभारी कुलपति थे.
प्रोफेसर कुद्दुस ने अपने पत्र में कहा है कि उन्हें 19 अगस्त 2021 को यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर के तौर पर पदभार ग्रहण करना था. वे पदभार ग्रहण करने पहुंचे लेकिन यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार मो हबीबुर रहमान ने उन्हें चार दिनों तक ऐसा करने से रोक दिया. इस बीच प्रभारी कुलपति सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने लाखों रूपए की हेराफेरी वाले कई फैसले किए. सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने लखनऊ की एक एजंसी को दोगुनी कीमत पर उत्तर पुस्तिका छापने के टेंडर दे दिया. पटना की एक खास एजंसी के जरिए आउटसोर्स कर्मचारियों की नियुक्ति में भी भारी घोटाला किया गया. कुद्दूस के पत्र के मुताबिक पहले उत्तर पुस्तिका की छपाई सात रूपए प्रति कॉपी होती थी. सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने सोलह रूपए प्रति कॉपी की दर से एक लाख 60 हजार कॉपी छापने का आर्डर दिया. बाद में कॉपी छापने वाली एजंसी ने 28 रूपए प्रति कॉपी की दर से बिल भेजा. कुद्दूस ने अपने पत्र में लिखा है कि उन पर राजभवन के नाम पर इस भारी लूटपाट वाले बिल के भुगतान का दवाब बनाया जा रहा है.
एसपी सिंह पर ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में भी भ्रष्टाचार करने का मामला सामने आया है. टेंडर में भ्रष्टाचार की बात किसी और नहीं बल्कि भाजपा विधायक संजय सरावगी ने की है. सरावगी ने बिहार सरकार के शिक्षा विभाग के अपर सचिव को जून में पत्र लिखा था. पत्र में यूनिवर्सिटी में चल रहे भ्रष्टाचार की बात की गई थी. ललित नारायण मिथिला विवि के कुलपति पर चहारदीवारी, केंद्रीय लाइब्रेरी भवन, गांधी सदन के सामने तालाब के सौंदर्यीकरण को लेकर आरोप लगाया कि इसके लिए दो करोड़ 56 लाख रुपए के लिये टेंडर निकले जाने में भ्रष्टाचार हुआ है. बताया जा रहा है कि निविदा निकलने के पहले से ही संवेदक ने काम शुरू कर दिया था. विवि प्रशासन ने सरकार के नियम की अनदेखी कर अपने करीबी संवेदक (ठेकेदार) को लाभ पहुंचाने को लेकर टेंडर प्रकाशित नहीं किया.
उससे पहले जिस कुलपति के ठिकानों पर छापेमारी में 30 करोड़ की जालसाजी का पता चला था उस पर भी राजभवन मेहरबान था. फागू चौहान ने भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों के आरोपी और स्पेशल विजलेंस यूनिट (एसवीयू) की छापेमारी में काली कमाई करने वाले मगध युनिवर्सिटी के वीसी राजेंद्र प्रसाद को छुट्टी पर भेज दिया. बिहार की स्पेशल विजलेंस यूनिट ने 17 नवंबर को रांजेद्र प्रसाद के ठिकानों पर छापेमारी कर दो करोड़ रुपए नकद, जेवरात और दस्तावेज बरामद किए. सूत्रों के मुताबिक अचल संपत्ति में अधिकतर जमीन के दस्तावेज हैं, जो 2018 से 2020 के बीच खरीदी गई हैं.
पूछताछ में पता चला कि कुलपति गोरखपुर में एक कॉलेज बनवा रहे हैं. एसयूवी इसका भी आकलन करेगी. पद पर रहते बिहार के पहले कुलपति हैं, जिनके यहां एसयूवी का छापा पड़ा. राजेंद्र प्रसाद ने मगध विश्वविद्यालय और वीरकुंवर सिंह विश्वविद्यालय के कुलपति के पद पर रहते हुए नाजायज ढंग से उत्तर पुस्तिका और किताबें खरीदीं. बिना जरूरत के ही उत्तर पुस्तिका और किताबें खरीदी गईं और टेंडर प्रक्रिया के विरुद्ध अपने चहेते आपूर्तिकर्ता से इनकी खरीद की. वीसी ने पिछले तीन साल में लगभग 30 करोड़ की सरकारी रकम का दुरुपयोग किया. दिलचस्प यह है कि विवि के लिए खरीदी गई सामग्री की फाइल भी वीसी के घर से बरामद हुई है. एसयूवी को जो दस्तावेज मिले हैं उसके अनुसार, विवि परिसर में मात्र 47 गार्ड कार्यरत हैं लेकिन 86 गार्ड के वेतन की निकासी की जा रही है और हर माह राशि गबन की जा रही है. सूत्रों के मुताबिक वीसी के कई अन्य घोटाले भी जल्द ही सामने आएंगे. इस छापेमारी के बाद राजेंद्र प्रसाद को आकस्मिक अवकाश पर भेद दिया गया. राजभवन के इस निर्णय से नीतीश सरकार खुश नहीं है.
घोटाला उजागर होने के बाद ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति एसपी सिंह के खिलाफ टेंडर घोटाला मामले में जांच की सिफारिश नीतीश कुमार ने की है. शिक्षा मंत्री विजय चौधरी ने बताया कि नीतीश कुमार ने राज्यपाल फागू चौहान को पत्र भेजा है. शिक्षा मंत्री ने कहा कि नीतीश कुमार भ्रष्टाचार मामले में कोई समझौता नहीं करते हैं. आरोपी वीसी के खिलाफ जांच होगी. मुख्यमंत्री ने शिक्षा विभाग को भी सजग रहने का निर्देश दिया है. भ्रष्टाचार का यह मामला काफी बड़ा है और मामला सामने आने के बाद सरकार और राजभवन आमने-सामने हैं. भाजपा ने इस पूरे मामले पर चुप्पी साध रखी है क्योंकि जो तथ्य सामने आए हैं उससे राज्यपाल बैकफुट पर हैं. केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बाद फागू चौहान और अलग-थलग पड़ गए हैं.











