झांसी/छतरपुर: बुंदेलखंड को भले ही वर्तमान दौर में अभावग्रस्त और समस्या ग्रस्त इलाके के तौर पर पहचाना जाता हो, मगर यह क्षेत्र अपनी संस्कृति और विरासत के मामले में समृद्धि शाली है, यह किसी से छुपा नहीं है। यही कारण है कि अब इस इलाके के खेलों पर शोध शुरू हो रहा है, ताकि दुनिया जान सके कि यहां कौन-कौन से खेल खेले जाते रहे हैं।
बुंदेलखंड वैसे तो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के सात सात जिलों को मिलाकर बनता है, कुल मिलाकर 14 जिले इस क्षेत्र में आते हैं। यह ऐसा इलाका है जो विरासत से भरा हुआ है, आजादी की लड़ाई की बात करें या साहित्य और संस्कृति या फिर स्थापत्य कला की, यहां की जल संरचनाएं भी निराली हैं, मगर उपेक्षा का शिकार हुई है। यहां के खेल भी धीरे-धीरे गुम होते गए और देश और दुनिया की बात तो दूर, यहां की नई पीढ़ी भी इनसे वाकिफ नहीं है।
जो इलाका कला और संस्कृति के मामले में समृद्ध हो वहां खेल तो रहे ही होंगे, इसे स्वीकार करने में किसी को भी हिचक नहीं होगी, यही कारण रहा कि खेलों में खास रूचि रखने वाले और खेल साक्षरता का अभियान चलाने वाले डॉ. कनिष्क पांडेय ने इस इलाके के खेलों को लेकर अध्ययन किया। इस अध्ययन के बाद उन्होंने यहां कौन-कौन से खेल खेले जाते थे, खेल क्यों गुम हुए और उन्हें पुनर्जीवित कैसे किया जा सकता है साथ ही उन खेलों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खेलों से किस तरह जोड़ा जा सकता है, यह विचार उनके मन में आए।
डॉ. पांडेय बताते हैं कि इसी को लेकर गाजियाबाद के आईटीएम इंस्टीट्यूट जो कि मैनेजमेंट प्रबंधन का पड़ा संस्थान है, उसने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झांसी के साथ एक करार किया है. इसके जरिए बुंदेलखंड के खेलों को लेकर शोध किया जाएगा। साथ ही उन खेलों को पुनर्जीवित करने की दिशा में कदम बढ़ाए जाएंगे।
कनिष्का पांडे कहते हैं कि बुंदेलखंड में मलखम जैसे खेल रहे हैं तो वही चितेरी जैसी कला। मलखम को तो देश और दुनिया के लोग जानते हैं, इसके अलावा भी बहुत से खेल ऐसे हैं जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खेलों से मेल खाते हैं। दुनिया के लोग बुंदेलखंड के खेलों के बारे में जाने और एक नई पहचान मिले इसके लिए यह शोध किया जाने वाला है।
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मुकेश पांडेय का कहना है कि डॉ. कनिष्क पांडेय ने बुंदेलखंड के खेलों को लेकर अध्ययन किया है और इस संबंध में उन्होंने विश्वविद्यालय से संपर्क किया और इस क्षेत्र के खेलों के भविष्य को सुरक्षित और सुदृढ़ रखने के लिए विश्वविद्यालय ने इस काम को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया, जिसके परिणामस्वरूप विश्वविद्यालय ने आईटीएम के स्पोर्ट्स रिसर्च सेंटर के साथ करार किया है।
आईएमटी के डायरेक्टर डॉ. विशाल तलवार का कहना है कि यह देश का अकेला ऐसा संस्थान है, जहां पर खेल को संस्कृति से जुड़ने के लिए लगातार शोध किए जा रहे हैं और साथ ही साथ देश के सुदूर क्षेत्रों में पारंपरिक खेलों को पहचान कर उन्हें पुनर्जीवित करने और उन्हें प्रोत्साहित करने का भी लगातार अध्ययन चल रहा है।
दोनों के बीच हुए करार बुंदेलखंड क्षेत्र में खेल की वर्तमान स्थिति का अध्ययन किया जाएगा, इस क्षेत्र में खेल साक्षरता की समीक्षा उस को बढ़ावा देने के प्रयास होंगे, साथ ही बुंदेलखंड क्षेत्र में ओलंपिक से संबंधित खेलों की स्थिति और उनके प्रोत्साहन के प्रयास किए जाएंगे। इसके साथ ही क्षेत्र के पारंपरिक खेलों के इतिहास में कौन-कौन से खेल हैं, आज उनकी क्या स्थिति है, उनके क्या लाभ थे, उनकी उपयोगिता कम क्यों होती गई और क्यों गुम होने की कगार पर पहुंच गए। इन खेलों को कैसे पुनर्जीवित किया जाए और प्रासंगिक बनाया जाए यह भी प्रयास होंगे।
बता दें कि इस विश्वविद्यालय के अधीन उत्तर प्रदेश के 7 जिले जालौन, झांसी, ललितपुर, महोबा, हमीरपुर, बांदा और चित्रकूट आते हैं। इन जिलों में स्थित कुल 362 महाविद्यालय हैं और इनमें लगभग ढाई लाख छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं।
बुंदेलखंड की संस्कृति से वास्ता रखने वालों का मानना है कि अगर यह पहल सफल होती है तो यहां के नौजवान ही नहीं दुनिया भी इन खेलों को जान सकेगी। इसके अलावा युवाओं की जिंदगी का हिस्सा भी बनेंगे। साथ ही, खेल और नई खेल प्रतिभाओं को तराशने में भी मदद मिलेगी।
–आईएएनएस











