लोकतंत्र की आड़ में ट्रंप ने चली चाल, वेनेजुएला में तेल का खेल बदलने की प्लानिंग कर रहा अमेरिका

नई दिल्ली । वेनेजुएला में अमेरिकी सैनिकों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर जो हमले किए और जिस तरह से वहां के तत्कालीन राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनकी पत्नी के साथ उठाकर लाया गया, इसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है। हालांकि, अमेरिका अपनी इस कार्रवाई को ड्रग्स तस्करी के खिलाफ उचित कदम बता रहा है। यह साफतौर पर जाहिर है कि अमेरिका ने ड्रग्स की आड़ में तेल पर कंट्रोल पाने के लिए चाल चली है। आइए जानते हैं कि अमेरिका वेनेजुएला में असल में क्या करने की कोशिश कर रहा है और ट्रंप के लिए पेट्रो डॉलर कैसे एक बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है।

वेनेजुएला एक ऐसा देश है जिसके पास दुनिया का सबसे अधिक तेल भंडार है। हालांकि, इसके बावजूद भी इसकी हालत बहुत खस्ता है। वहीं अमेरिका के लिए वेनेजुएला के तेल भंडार पर नियंत्रण पाना ही लक्ष्य नहीं है, बल्कि पेट्रो डॉलर को लेकर जारी जंग में जीत हासिल करना भी है।

ट्रेड वर्ल्ड में बीते 50 सालों से डॉलर का राज चला आ रहा है। हालांकि, वैश्विक राजनीति और व्यापार में बड़ा बदलाव धीरे-धीरे दस्तक दे रहा है। पहले सभी व्यापार डॉलर में हुआ करते थे, जिससे इसकी वैल्यू बनी हुई थी। हालांकि, अब व्यापार का फोकस धीरे-धीरे शिफ्ट हो रहा है और इसकी शुरुआत वेनेजुएला ने की थी।

पेट्रोडॉलर का मतलब तेल निर्यातक देशों द्वारा तेल की बिक्री किसी अन्य मुद्रा के बजाय अमेरिकी डॉलर में करना है। आसान शब्दों में कहा जाए तो, पेट्रोडॉलर अमेरिकी डॉलर है, जिसका इस्तेमाल दुनिया के तमाम देश कच्चा तेल खरीदने के लिए करते हैं। पेट्रोडॉलर ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था की नींव है। ऐसे में यह समझना आसान है कि अमेरिका के लिए पेट्रोडॉलर को डिमांड में बनाए रखना कितना जरूरी है।

अमेरिका ने 14 मार्च 1900 को गोल्ड स्टैंडर्ड एक्ट को मंजूरी दी, जिसके तहत 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत 90 फीसदी प्योर 25.8 ग्रेन गोल्ड हो गई। इसका मतलब 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत करीब 1.67 ग्राम तय की गई। धीरे-धीरे पूरी दुनिया में गोल्ड स्टैंडर्ड के आधार पर डॉलर में व्यापार शुरू हुआ और इसके साथ ही अमेरिका ने अर्थव्यवस्था के मामले में महाशक्ति बनने की कहानी लिखनी शुरू कर दी। इसके बाद से अमेरिका का वैश्विक राजनीति में दबदबा बढ़ता गया और डॉलर को मजबूती मिलने लगी।

अब अमेरिका दुनिया से व्यापार के माध्यम से मिलने वाले गोल्ड, सिल्वर जैसे कीमती धातु को अपने फोर्ट नॉक्स बेस में जमा करने लगा। हालांकि, 1970 का एक ऐसा दौर आया, जब वियतनाम युद्ध और बढ़ते घाटों के बीच सभी देश अमेरिका को उसका डॉलर देकर अपना गोल्ड और अन्य कीमती धातु वापस मांगने लगे। अमेरिकी डॉलर पर घनघोर संकट मंडराने लगा, लेकिन फिर यूएस ने इसका तोड़ निकाला।

1974 में अमेरिका और सऊदी अरब के बीच एक सीक्रेट समझौता हुआ, जिसके तहत दुनिया में जितना भी तेल व्यापार होगा, वह डॉलर में होने पर सहमति हुई। इसके बदले अमेरिका ने सैन्य सुरक्षा और हथियार देने का वादा किया। अमेरिका के तत्कालीन विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने सऊदी अरब के साथ इस डील पर मुहर लगाई थी, ताकि डॉलर हमेशा डिमांड में रहे।

1974 के अमेरिका और सऊदी अरब के समझौते के बाद दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारक वेनेजुएला की इस कहानी में एंट्री होती है। अमेरिका ने वेनेजुएला पर कई प्रतिबंध लगा रखे थे। इसकी वजह से आर्थिक संकट से जूझ रहे वेनेजुएला ने व्यापार के लिए रूस और चीन की ओर अपना रुख किया। वेनेजुएला चीन और रूस के साथ जो व्यापार कर रहा था, वह डॉलर में नहीं था। इसकी वजह से अमेरिका और वेनेजुएला के बीच तनाव और बढ़ता चला गया।

दरअसल, 1976 में वेनेजुएला सरकार ने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया था, जिसके बाद विदेशी तेल कंपनियों के सभी तरह के ऑपरेशन वहां की सरकारी कंपनी पेट्रोलियोस डी वेनेजुएला (पीडीवीएसए) के तहत आ गए थे।

वेनेजुएला सरकार के इस कदम की वजह से अमेरिका की परेशानी बढ़ गई। अमेरिका के लिए वेनेजुएला से तेल निकालने की प्रक्रिया काफी मुश्किल वाली हो गई। ध्यान रहे, वेनेजुएला के पास पूरी दुनिया का 20 फीसदी तेल भंडार है, जो 303 अरब बैरल के करीब कहा जाता है।

इसके साथ ही, वेनेजुएला ने 2018 में डॉलर सिस्टम से खुद को अलग करने का ऐलान किया। वेनेजुएला ने डॉलर के अलावा अन्य करेंसी में ट्रेड का रास्ता खोलने के लिए एक नींव रख दी। चीन युआन में तो रूस रूबल में लगभग सारा ट्रेड करता है। वहीं, हाल ही में ब्रिक्स देशों ने भी रुपए में व्यापार करने पर मुहर लगा दी। ऐसे में दुनिया के तमाम देशों में डॉलर पर निर्भरता कम करने की सुगबुगाहट तेज होने लगी।

वहीं, वेनेजुएला उन सभी देशों के करीब जा रहा था जो डॉलर में व्यापार नहीं करते हैं। इन देशों में मुख्यतः चीन, रूस, और ईरान हैं। इसके अलावा, वेनेजुएला ब्रिक्स में भी शामिल होना चाहता था। अगर ऐसा हो जाता है, तो अर्थव्यवस्था की नगरी में विराजमान डॉलर का सिंहासन पूरी तरह से हिल जाता। चीन पहले से ही वेनेजुएला का सबसे बड़ा खरीदार है।

यही कारण है कि अमेरिका ने वेनेजुएला पर हमला किया और मादुरो को सत्ता से हटाया, ताकि तेल का व्यापार फिर से डॉलर में हो सके। हालांकि, अमेरिका ने पहली बार इस नीति को नहीं अपनाया है। इससे पहले भी जब किसी देश के शासक ने डॉलर को ठुकराकर अन्य करेंसी में व्यापार करने की कोशिश की, उसका अंजाम बुरा हुआ।

–आईएएनएस

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