यूके ने ग्लोबल हेल्थ फंड में की 15 फीसदी कटौती, स्वास्थ्य संगठन बोले-अफ्रीकी देशों पर पड़ेगा असर

नई दिल्ली । यूके ने ग्लोबल हेल्थ फंड में 15 फीसदी कटौती करने के फैसले ने दुनिया के कई प्रमुख स्वास्थ्य संगठनों को चिंता में डाल दिया है। ‘ग्लोबल फंड’, ‘यूएनएड्स’, ‘डब्ल्यूएचओ’ (विश्व स्वास्थ्य संगठन), ‘एमएसएफ’ और ‘मलेरिया नो मोर यूके’ जैसे संगठनों ने साफ कहा है कि इस कदम का सबसे ज्यादा नुकसान अफ्रीकी देशों को होगा, जहां पहले से ही संसाधन सीमित हैं और बड़ी आबादी एचआईवी, टीबी और मलेरिया जैसी बीमारियों से जूझ रही है।

यूके पहले ग्लोबल फंड में लगभग 1 अरब पाउंड स्टर्लिंग का योगदान करता था, लेकिन अब यह घटकर 850 मिलियन पाउंड स्टर्लिंग रह गया है। ग्लोबल फंड ने कहा कि यह कटौती अफ्रीका के लिए “सीधा झटका” है, क्योंकि इन बीमारियों से लड़ने के लिए सबसे ज्यादा निर्भरता इसी फंड पर है। यूएनएड्स ने चेतावनी दी कि इससे कई देशों में एचआईवी रोकथाम कार्यक्रम धीमे पड़ जाएंगे और कई लोग समय पर दवा न मिलने की वजह से खतरे में आ सकते हैं। डब्ल्यूएचओ ने कहा कि अफ्रीका जैसे महाद्वीप, जहां स्वास्थ्य ढांचा पहले ही कमजोर है, वहां यह कटौती “जिंदगियों की कीमत” पर पड़ेगी।

अक्टूबर में प्रकाशित एक शोध के अनुसार ग्लोबल फंड में 20 फीसदी की कटौती से 2040 तक अकेले मलेरिया से 3,30,000 अतिरिक्त मौतें होंगी। यह कोष मलेरिया के लिए 59 फीसदी अंतर्राष्ट्रीय फंड प्रदान करता है।

एमएसएफ, जो दुनिया के सबसे कठिन इलाकों में चिकित्सा सेवाएं देती है, ने कहा कि अब देशों को “असंभव फैसले” लेने होंगे—किसे मलेरिया की दवा मिलेगी और किसे इंतजार करना पड़ेगा, किस गांव में एचआईवी टेस्ट उपलब्ध होंगे और कहां रोक दिए जाएंगे। मलेरिया नो मोर यूके ने बताया कि कम फंड का सीधा असर मच्छरदानियों की सप्लाई, दवाइयों के वितरण और जांच अभियानों पर पड़ेगा, जिससे संक्रमण बढ़ सकता है।

यह कटौती ऐसे वक्त में हुई है जब अफ्रीका के कई देशों में दवाइयों की कीमतें बढ़ रही हैं, जलवायु परिवर्तन की वजह से मलेरिया का खतरा फैल रहा है और एचआईवी और टीबी की रोकथाम के लिए लगातार निवेश की जरूरत है।

ब्रिटिश सरकार का कहना है कि आर्थिक परिस्थितियों और बजट दबाव के कारण यह फैसला लिया गया है, लेकिन इससे मिलने वाली मदद फिर भी “जीवन बचाएगी।”

हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य समुदाय चिंतित है कि जब एक बड़ा डोनर फंड घटाता है, तो इसका असर सिर्फ पैसों तक सीमित नहीं रहता—यह वैश्विक बीमारी नियंत्रण की पूरी लड़ाई को कमजोर कर देता है। अफ्रीका में काम करने वाले संगठनों का मानना है कि यह कदम उन देशों के लिए बड़ा झटका है, जिनके लिए स्वास्थ्य फंड किसी जीवनरेखा से कम नहीं।

–आईएएनएस

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