ओबीसी संशोधन: क्या एक बार फिर देश के सामाजिक-राजनीतिक परिदृष्य में आएगा बदलाव

राज्यों को ओबीसी में जातियां जोड़ने का अधिकार देने संबंधी संविधान संशोधन

न जाने क्यों राज्यों को अन्य पिछड़े वर्गो की जातियों की पहचान कर जोड़ने का अधिकार देने के लिए हाल ही में संसद द्वारा संविधान के 127वें संशोधन विधेयक को मंजूर करने की घटना ने सहसा 36 साल पुराने शाहबानो प्रकरण में उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद उत्पन्न स्थिति की याद ताजा कर दी।

नरेन्द्र मोदी सरकार ने 127वें संविधान संशोधन के माध्यम से उच्चतम न्यायालय के पांच मई 2021 के उस फैसले को निष्प्रभावी बनाया है जिसमे संविधान पीठ ने कहा था कि सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण के लिए अन्य पिछड़े वर्गो में जातियों को जोड़ने का अधिकार राज्यों को नहीं केंद्र को है।

चूंकि अब संसद ने इस फैसले को निष्प्रभावी बनाने के लिए संविधान संशोधन को मंजूरी दे दी है। ऐसी स्थिति में इस नए संविधान संशोधन की न्यायिक समीक्षा निश्चित लग रही है।

इसी तरह, 23 अप्रैल, 1985 को शीर्ष अदालत की संविधान पीठ ने शाहबानो प्रकरण नाम से चर्चित मोहम्म्द अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम प्रकरण में तलाक का शिकार मुस्लिम महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए इस तलाकशुदा मुस्लिम महिला को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता देने का फैसला सुनाया था।

मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथियों ने जब इसका विरोध किया तो तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने जनवरी 1986 में इस फैसले को निष्प्रभावी बनाने के लिए मुस्लिम स्त्री (विवाह विच्छेद पर अधिकार संरक्षण) कानून बनाया। यह कानून मई, 1986 से देश में लागू है। इसके तहत तलाकशुदा महिला को सिर्फ इद्दत के दौरान ही गुजारा भत्ता मांगने की इजाजत है।

उच्चतम न्यायालय ने इस साल पांच मई को आरक्षण से संबंधित मामले में सुनाए गए फैसले से कहा था कि अन्य पिछड़े वर्गो की सूची में किसी भी जाति को जोड़ने का अधिकार राज्यों को नहीं अपितु केन्द्र के पास हे। यह प्रकरण महाराष्ट्र में मराठा समुदाय को आरक्षण दिये जाने से संबंधित था। इस तरह देखा जाए तो न्यायालय ने आरक्षण के लिए अन्य पिछड़े वर्गो की सूची में नयी जातियों को शामिल करने की राजनीति पर अंकुश लगाने का प्रयास किया था।

राजनीतिक दलों को नागवार लगा और उन्होंने नए सिरे से संविधान संशोधन की मांग करके उच्चतम न्यायालय का फैसला बदलने की मांग शुरू कर दी। आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश और पंजाब सहित कुछ राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव के मद्देनजर अन्य पिछड़े वर्गो के वोटों के लिए यह निश्चित ही एक अच्छी मांग लगी। सरकार ने भी मानसून सत्र के दौरान विपक्षी सदस्यों के हंगामे के बीच इसे पारित कराने का निणर्य लिया। विपक्ष ने भी अपना विरोध भूलकर इसका समर्थन करने में अपनी राजनीतिक भलाई समझी और संसद ने फटाफट इस संशोधन विधेयक को मंजूरी दे दी।

इस संविधान संशोधन के बावजूद सरकारी नौकरियों और शिक्षा में प्रवेश के लिए आरक्षण की 50 फीसदी की अधिकतम सीमा अभी भी जस की तस है। आरक्षण की इस सीमा को बढ़ाने की मांग लगातार हो रही है। मराठा आरक्षण से संबंधित मसले की सुनवाई के दौरान भी संविधान पीठ के समक्ष यह मुद्दा उठा था और मांग की गयी थी कि मंडल कमीशन के नाम से चर्चित इन्दिरा साहनी प्रकरण में नौ सदस्यीय संविधान पीठ के फैसले पर नये सिरे से विचार करने के लिए इसे 11 सदस्यीय संविधान पीठ को सौंपा जाए। लेकिन न्यायालय ने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया था।

संसद में भी बहस के दौरान 50 फीसदी आरक्षण की लक्ष्मण रेखा से बाहर निकलने की मांग की गयी। सदस्यों का कहना था कि सरकार को आरक्षण से संबंधित 50 फीसदी की सीमा बढ़ाने के लिए संसद में कानून बनाना चाहिए लेकिन अभी सरकार ने विपक्षी की इस मांग पर बहुत ज्यादा गंभीरता से ध्यान नहीं दिया है।

राष्ट्रपति से संसद से मंजूर इस संविधान संशोधन विधेयक को संस्तुति मिलते ही राज्यों को अन्य पिछड़े वर्गो की सूची में अपनी इच्छा से जातियों को अधिसूचित करने का अधिकार मिल जाएगा। ध्यान रहे कई राज्यों में इस आरक्षण को लेकर आंदोलन हो रहे है।

महाराष्ट्र में मराठा, हरियाणा में जाट, गुजरात में पटेल और कर्नाटक में लिंगायत समुदाय खुद को अन्य पिछड़े वर्ग की सूची में शामिल करने की मांग कर रहा है। राज्यों के लिए भी अन्य पिछड़े वर्गो की सूची के लिए निर्धारित 27 फीसदी में सभी जातियों को शामिल करना और उन्हें संतुष्ट करना संभव नहीं होगा। ऐसी स्थिति में इस आरक्षण का लाभ प्राप्त करने क लिए बनाए गए नियमों को सख्त बनाना होगा तथा अन्य पिछड़े वर्गों में आरक्षण के लाभ के दायरे से इनके संपन्न तबकों को बाहर रखने के पैमाने को भी अधिक कठोर बनाने की आवश्यकता होगी ताकि जरूरतमंद वर्गों को इसका लाभ मिल सके।

ठीक ऐसा ही कुछ शाहबानो प्रकरण में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ के 23 अप्रैल, 1985 के फैसले के बाद हुआ था। उस समय शीर्ष अदालत की व्यवस्था की आड़ में सांस्कृतिक और धार्मिक विविधताओं से भरपूर इस देश के सांप्रदायिक सद्भाव के ताने बाने का प्रभावित करने के प्रयास किए गए थे।

केन्द्र ने जनवरी, 1986 में मुस्लिम समाज के कट्टरपंथी वर्ग को संतुष्ट करने के लिए शाहबानो प्रकरण में न्यायालय का फैसला बदलने के लिए नया कानून बनाया और दूसरी ओर हिन्दू समाज को खुश करने के लिए फरवरी, 1986 में अयोध्या में लंबे समय से विवाद का केंद्र रहे राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवादित स्थल का ताला अदालत के आदेश के तहत खोला गया।

मजे की बात यह है कि अदालत में तत्कालीन जिलाधीश और पुलिस अधीक्षक ने कहा था कि विवादित स्थल का ताला खुलने से किसी प्रकार की कानून व्यवस्था की समस्या पैदा नहीं होगी। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हुआ, निश्चित ही नहीं।

राजीव गांधी सरकार के कार्यकाल में विवादित स्थल का ताला खुला और फिर वहां शिलान्यास की प्रकिया भी संपन्न हुई। इसके बाद रही सही कसर विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मोर्चा सरकार ने पूरी कर दी थी।

राजनीतिक अंतर्विरोधों के साथ सत्ता में आए राष्ट्रीय मोर्चा के नेतृत्व में दरार पड़नी शुरू हुई तो भाजपा इससे बाहर हो गयी। भाजपा के सरकार से बाहर होते ही प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अन्य पिछड़े वर्गो के लिए आरक्षण से संबंधित मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के फैसले की घोषणा कर दी। इसी दौरान विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार से बाहर आ चुकी भाजपा के प्रमुख नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने राम रथ यात्रा शुरू की और इसके नतीजे सबके सामने हैं।

शाहबानो प्रकरण में शीर्ष अदालत के फैसले को निष्प्रभावी बनाने के तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के कार्यकाल के दौरान उठाए गए इन कदमों के नतीजे सबके सामने हैं।

मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार के फैसले के खिलाफ देश में कई स्थानों पर आंदोलन हुआ। अंतत: यह विवाद निपटारे के लिए उच्चतम न्यायालय पहुंचा।

शीर्ष अदालत की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने 16 नवंबर, 1992 को इन्दिरा साहनी प्रकरण में अपने ऐतिहासिक फैसल में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से अन्य पिछड़े वर्गो के लिये 27 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था को सही ठहराया था लेकिन इसके साथ ही न्यायालय ने आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत निर्धारित कर दी थी। न्यायालय की व्यवस्था एकदम स्पष्ट थी कि आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता लेकिन तमिलनाडु सरीखे कुछ राज्यों ने यह सीमा लांघी और इस तरह के विवाद अभी भी लंबित हैं।

उम्मीद की जानी चाहिए की अन्य पिछड़े वर्गों की सूची में अन्य जातियों को शामिल करने संबंधी यह संविधान संशोधन इस मामले में समस्याओं को बढ़ाने की बजाए इनका समाधान करने वाला साबित होगा।

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