रांची: पूरे देश में पौधों और वनस्पतियों की कई प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं। इनमें कई पौधे ऐसे हैं, जो दुर्लभ और औषधीय गुणों वाले हैं। सरकार ने ऐसे पौधों को संरक्षित करने के लिए फॉरेस्ट जीन बैंक बनाने की पहल की है। जीन संरक्षित रखने का लाभ यह होगा कि भविष्य में इन पौधों के पूरी तरह खत्म होने का खतरा नहीं रहेगा। जरूरत के अनुसार इन्हें फिर से उगाया जा सकेगा। ऐसा ही एक फॉरेस्ट जीन बैंक झारखंड के रांची में भी विकसित किया गया है, जहां पूर्वी भारत के चार राज्यों बिहार, बंगाल, उड़ीसा और झारखंड के वन क्षेत्रों में पाये जाने वाले दुर्लभ पौधों-वनस्पतियों के जीन संरक्षित किये जा रहे हैं। रांची स्थित भारत सरकार के वन उत्पादकता संस्थान के परिसर में विकसित किये गये इस फॉरेस्ट जीन बैंक में फिलहाल छह प्रजातियों के पौधों के जीन संरक्षित किये गये हैं। इन पौधों में चिरौंजी, करम, बीजासाल, कुल्लू, सलई और मैदा छाल शामिल हैं। ये सभी वनस्पतियां मुख्य तौर पर पूर्वी भारत के राज्यों में ही बहुतायत में मौजूद रही हैं, लेकिन बीते तीन से चार दशकों में पेड़ों की कटाई से इनके विलुप्त होने का खतरा पैदा हो गया। भारत सरकार के फॉरेस्ट जेनेटिक रिसर्च प्रोग्राम के तहत वन्य विशेषज्ञों ने इनकी पहचान की और इसके बाद इनके जीन यहां माइनस पंद्रह डिग्री के तापमान पर संरक्षित किये गये हैं। ये सभी पौधे औषधीय और विशिष्ट गुणों वाले हैं।
रांची वन उत्पादकता संस्थान के शोध समन्वयक यज्ञनेश्वर मिश्रा बताते हैं कि जीन बैंक एकप्रकार का बायो रिपोजिटरी है जो आनुवंशिक सामग्री को संरक्षित करता है। यहां वनस्पतियों के बीज, फल, पराग, उत्तक, जर्मप्लाज्म आदि वैज्ञानिक तौर पर इस तरह संरक्षित किये जाते हैं कि जरूरत के अनुसार उनका उत्पादन किया जा सके। जर्मप्लाज्म जीवित उत्तक हैं जिससे नए पौधे उगाए जा सकते हैं। मसलन, उड़ीसा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर में जिस देवभोग नामक धान से बने चावल का भोग लगता था, उसकी प्रजाति पूरी तरह नष्ट हो गया था। इसका जीन राष्ट्रीय जीन बैंक में संरक्षित था, जिससे इसका पुन: उत्पादन संभव हो पाया।
–आईएएनएस











