दिल्ली में 1997 में उपहार सिनेमाघर में हुए भीषण अग्निकांड से लेकर पिछले दिनों मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित कमला नेहरू अस्पताल में हुए अग्निकांड की घटनाएं शासन प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और लापरवाही को उजागर कर रही हैं। निश्चित ही इस तरह की घटनाएं मानवीय त्रासदी हैं।
अस्पतालों और बहुमंजिली इमारतों में अग्निकांड की घटनाएं प्रशासन, प्रबंधन और ठेकेदारों के साथ ही देश की अग्निशमन व्यवस्था को भी कटघरे में खड़ा कर रही हैं। शासन तथा प्रशासन, विशेषकर आग से बचाव के उपायों के बारे में अनापत्ति प्रमाण पत्र देने वाले अग्निशमन विभाग, इन हादसों के लिए अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते हैं।
देश के विभिन्न राज्यों के अस्पतालों में बार बार हो रही अग्निकांड की इस तरह की घटनाएं मरीजों और निवासियों की सुरक्षा को लेकर अनेक सवाल खड़े कर रही हैं। इन भवनों में अग्निरोधी सुविधाओं और निकासी की पर्याप्त सुविधा के अभाव की ओर लगातार ध्यान आकर्षित किया जा रहा है। लेकिन ऐसा लगता है कि शासन और प्रशासन पर इसका कोई असर नहीं पड़ रहा है।
कोविड-19 के दौरान गुजरात और महाराष्ट्र के कई अस्पतालों में अग्निकांड की घटनाओं के बाद शीर्ष अदालत ने भी कड़ा रुख अपनाया। न्यायालय ने इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाने के लिए राज्य सरकारों की तीखी आलोचना भी की। यही नहीं, न्यायालय ने अस्पतालों में अग्निशमन व्यवस्था के ऑडिट का आदेश भी दिया लेकिन इसके बाद भी स्थिति में सुधार नहीं हुआ है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि देश में अस्पताल एक बड़े उद्योग की शक्ल ले चुका है लेकिन क्या इस उद्योग को लोगों के जीवन की कीमत पर फलने फूलने की इजाजत दी जा सकती है?
कोविड-19 के दौरान गुजरात और महाराष्ट्र के कुछ अस्पतालों में हुए अग्निकांड में आईसीयू मे भर्ती कई मरीजों की मौत होने और बड़ी संख्या में उनकी हालत बिगड़ने की घटना सर्वविदित है।
इसी से संबंधित राजकोट और अहमदाबाद में अस्पतालों में हुए अग्निकांड की घटनाओं का शीर्ष अदालत ने स्वत: ही संज्ञान लिया था। ऐसे ही एक मामले में शीर्ष अदालत ने इसी साल जुलाई में सख्त शब्दों में कहा था कि अस्पतालों को नागरिकों की जान की कीमत पर फलने फूलने नहीं दिया जा सकता और अगर उनमें अग्निशमन की पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं तो सरकार को उन्हें बंद कर देना चाहिए। ऐसा कभी नहीं दिखना चाहिए की सरकार ऐसे अस्पतालों को बचा रही है।
इससे पहले, नौ दिसंबर, 2020 को शीर्ष अदालत ने केन्द्र सरकार को सभी राज्यों से अस्पतालों में किए गए अग्निसुरक्षा संबंधित ऑडिट रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया था। न्यायालय चाहता था कि कोविड अस्पतालों में महीने में कम से कम एक बार इस तरह के ऑडिट के लिए एक समिति गठित की जानी चाहिए और अस्पतालों को अग्निशमन सुविधाओं की खामियों से अवगत कराया जाना चाहिए।
देश के विभिन्न राज्यों में स्थित अस्पतालों, विशेषकर निजी अस्पताल और नर्सिंग होम, में अग्नि से सुरक्षा के उपायों का मुद्दा लगातार शीर्ष अदालत की नजरों में है। गुजरात और महाराष्ट्र के कई अस्पतालों में हुए अग्निकांड की घटनाओं के बाद से ही न्यायालय इनमें आग से सुरक्षा के उपायों को लेकर जानकारी मांग रहा है। लेकिन इसके बावजूद राज्य सरकारें ऐसे मामलों में ढुलमुल रवैया अपनाने के साथ ही अग्नि सुरक्षा के उपायों में कोताही बरतने वाले निजी अस्पतालों को किसी न किसी तरह से बचाने के प्रयासों से बाज नहीं आ रही हैं।
स्थिति यह है कि न्यायालय ने इसी तरह के प्रयास करने वाली गुजरात सरकार को हाल ही में कड़ी फटकार लगाई और निजी अस्पतालों को राहत प्रदान करने के लिए जारी की गयी राज्य सरकार की अधिसूचना के अमल पर रोक लगा दी है।
न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद यह तथ्य भी सामने आया है कि बड़ी संख्या में अस्पतालों और नर्सिंग होम में अग्नि सुरक्षा के न तो उपाय हैं और न ही उनके पास इससे संबंधित अनापत्ति प्रमाण पत्र है।
ऐसी स्थित में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर अग्निशमन के पर्याप्त उपायों के बगैर ये अस्पताल कैसे चल रहे हैं और अग्निशमन विभाग इनके खिलाफ कोई कदम क्यों नहीं उठा रहा है।
अस्पतालों, शॉपिंग माल और बहुमंजिली इमारतों आदि के निर्माण संबंधी नियमों में अग्निशमन और आपात निकासी की प्रभावी व्यवस्था का प्रावधान है। इसके लिए अग्निशमन विभाग से पूरी जांच पड़ताल के बाद अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना होता है।
लेकिन अक्सर यह देखा गया है कि इन इमारतों और परिसरों के पास अग्निशमन विभाग का प्रमाण होने के बावजूद आग से बचाव की पर्याप्त सुविधाओं का अभाव रहता है। ऐसा क्यों हैं, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। अग्निशमन विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत के बगैर किसी भी भवन को अग्निशमन से संबंधित सुविधाएं नहीं होने या आधी अधूरी व्यवस्था के बावजूद भवन में निवास या कारोबार के लिए उपयुक्त होने संबंधी अनापत्ति प्रमाण पत्र मिलना संभव नहीं है।
अस्पतालों, शापिंग माल, दूसरे सार्वजनिक स्थलों और बहुमंजिली इमारतों में अग्नि सुरक्षा के पुख्या उपाय सुनिश्चित करने के लिए राज्यों के अग्निशमन विभाग की कार्यशैली को अधिक पारदर्शी और चुस्त बनाने की आवश्यकता है ताकि अग्नि सुरक्षा के उपायों के बारे में सख्ती से नियमों का पालन हो और अग्निशमन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र के बगैर किसी भी सार्वजनिक भवन में जनता को आने की अनुमति नहीं हो। यही नहीं, यह भी सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि आधी अधूरी तैयारियों या अग्नि सुरक्षा के पूरे उपायों के अभाव वाले किसी भी भवन को अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं मिल सके।
इंडिया न्यूज स्ट्रीम











