मुस्लिम महिलाओं के समान उत्तराधिकार अधिकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी किया

नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकारों से जुड़े एक अहम मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। यह मामला शरीयत आधारित उत्तराधिकार कानून को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका (पीआईएल) से जुड़ा है, जिसमें मुस्लिम महिलाओं के साथ कथित भेदभाव का मुद्दा उठाया गया है। अदालत ने इस मामले को संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते हुए केंद्र से विस्तृत प्रतिक्रिया मांगी है।

याचिका में यह सवाल उठाया गया है कि क्या कोई मुस्लिम व्यक्ति मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत शासित न होने का विकल्प चुन सकता है और क्या वह भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत अपने उत्तराधिकार के मामलों को संचालित कर सकता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि वर्तमान व्यवस्था में मुस्लिम महिलाओं को संपत्ति के अधिकारों में समानता नहीं मिलती, जो संविधान के मूल अधिकारों के विपरीत है।

सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि क्या कोई गैर-मुस्लिम व्यक्ति इस तरह की याचिका दायर कर सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि इस मुद्दे से सीधे प्रभावित मुस्लिम महिलाएं स्वयं याचिकाकर्ता बनकर सामने आती हैं और यह दिखा पाती हैं कि उनके अधिकार प्रभावित हो रहे हैं, तभी अदालत इस मामले की गहराई से सुनवाई कर सकेगी।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि कई मुस्लिम संगठनों ने लिखित रूप में इस याचिका का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम महिलाओं के विरासत अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए और वर्तमान प्रावधान इस दिशा में बाधा बन रहे हैं। भूषण ने यह भी तर्क दिया कि इस्लाम के तहत यह कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है कि व्यक्ति अपनी स्व-अर्जित संपत्ति की वसीयत अपनी इच्छा के अनुसार न कर सके।

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह के सुधार आदर्श रूप से समुदाय के भीतर से आने चाहिए थे, न कि अदालत के हस्तक्षेप से। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रशांत भूषण ने कहा कि भेदभावपूर्ण कानूनों को समाप्त करना निश्चित रूप से सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है।

मामले के दौरान अनुच्छेद 25 का मुद्दा भी उठा, जो धर्म की स्वतंत्रता से जुड़ा है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस पहलू को देखते हुए जरूरी है कि वास्तविक प्रभावित पक्ष यानी मुस्लिम महिलाएं मामले में पक्षकार या हस्तक्षेपकर्ता के रूप में शामिल हों, ताकि यह किसी बाहरी हस्तक्षेप की तरह न लगे। इस दौरान समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर भी बहस छिड़ी। प्रशांत भूषण ने कहा कि यदि यूसीसी लागू किया जाता है, तो उसमें सभी धर्मों के सबसे उदार और गैर-भेदभावपूर्ण प्रावधानों को शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि केवल मुस्लिम कानून ही नहीं, बल्कि हिंदू उत्तराधिकार कानूनों में भी विभिन्न समुदायों और परंपराओं के आधार पर असमानताएं मौजूद हैं, जिन्हें सुधारने की आवश्यकता है।

जस्टिस बागची ने इस दौरान यह भी सवाल उठाया कि क्या सामाजिक सुधार करना न्यायपालिका के दायरे में आता है। इस पर भूषण ने जवाब दिया कि जब कोई कानून स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण हो, तो उसे खत्म करना अदालत का कर्तव्य है। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और याचिकाकर्ता को निर्देश दिया है कि वे इस मामले में वास्तविक प्रभावित मुस्लिम महिलाओं को भी पक्षकार के रूप में शामिल करें।

–आईएएनएस

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