हिन्दी साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल को वर्ष 2024 का 59वां ज्ञानपीठ पुरस्कार

नई दिल्ली | के लिए 59वे ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रतिष्ठित हिंदी साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल को प्रदान किए जाने की घोषणा की गई है।
यह सम्मान उन्हें हिंदी साहित्य में उनके अद्वितीय योगदान, सृजनात्मकता और विशिष्ट लेखन शैली के लिए प्रदान किया जा रहा है।वे हिन्दी के 12वें साहित्यकार हैं जिन्हें यह पुरस्कार प्रदान किया जा रहा है।

इस प्रतिष्ठित सम्मान के अंतर्गत 11 लाख रुपये की राशि, वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है।

सुप्रसिद्ध कथाकार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित श्रीमती प्रतिभा राय की अध्यक्षता के हुई प्रवर परिषद की बैठक में यह निर्णय लिया गया।

चयन समिति के अन्य सदस्य माधव कौशिक, दामोदर मावजो, श् प्रभा वर्मा, डॉ. अनामिका, डॉ. ए॰ कृष्णा राव, प्रफ्फुल शिलेदार, डॉ. जानकी प्रसाद शर्मा और ज्ञानपीठ के निदेशक मधुसूदन आनन्द हैं

विनोद कुमार शुक्ल (जन्म: 1 जनवरी 1937) हिंदी साहित्य के एक प्रतिष्ठित लेखक, कवि और उपन्यासकार हैं। उनका लेखन सरल भाषा, गहरी संवेदनशीलता और अद्वितीय शैली के लिए जाना जाता है। वे मुख्य रूप से आधुनिक हिंदी साहित्य में प्रयोगधर्मी लेखन के लिए प्रसिद्ध हैं।

विनोद कुमार शुक्ल की पहली कविता पुस्तिका वर्ष 1971 में ‘लगभग जयहिंद’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। उनके प्रमुख उपन्यासों में “नौकर की कमीज़”, “दीवार में एक खिड़की रहती थी”, और “खिलेगा तो देखेंगे” शामिल हैं। उनकी कविताएँ और कहानियाँ आम जीवन की बारीकियों को सहज भाषा में प्रस्तुत करती हैं।

उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार और अन्य प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया है। उनका लेखन आम आदमी की भावनाओं, उसकी रोजमर्रा की जिंदगी और समाज की जटिलताओं को खूबसूरती से व्यक्त करता है
हिंदी के प्रख्यात कवि एवं कथाकार विनोद कुमार शुक्ला को 59 में ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने की आज घोषणा की गई ।

88 वर्षीय श्री शुक्ला को यह पुरस्कार उनके आजीवन लेखन के लिए दिया जा रहा है ।।पुरस्कार में 11 लख रुपए की राशि स्मृति चिन्ह प्रशस्ति पत्र तथा वाग्देवी की प्रतिमा शामिल है ।
ज्ञानपीठ की चयन समिति की बैठक में यह फैसला लिया गया।

छत्तीसगढ़ के रायपुर में कृषि कालेज से रिटायर श्री शुक्ला को उनके दूसरे उपन्यास दीवार में खिड़की रहा करती थी के लिए 1999 में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिल चुका है और वह साहित्य अकादमी के फेलो भी हैं ।
श्री शुक्ला ने सातवें दशक में अपना लेखन शुरू किया था और अपने पहले कविता संग्रह “वह आदमी चला गया गरम कोट पहनकर विचार की तरह” से हिंदी में चर्चित हुए थे .इससे पहले 1971 में उनकी काव्य पुस्तिका “लगभग जय हिंद “नाम से पहचान सीरीज में छप चुकी थी .

श्री शुक्ला 1981 में प्रकाशित “ नौकर की कमीज “उपन्यास से साहित्य में स्थापित हुए थे। इस उपन्यास पर एक फ़िल्म भी बन चुकी है।

1 जनवरी 1937 में जन्मे श्री शुक्ल ने जबलपुर से कृषि विज्ञान से एमए सी किया था।उसके बाद वह रायपुर में लेक्चरर बन गए थे।

— इंडिया न्यूज स्ट्रीम

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