बांग्लादेश चुनाव: बीएनपी की बढ़त के बावजूद जमात का समर्थन क्यों कर रहे हैं चीन और पाकिस्तान?

नई दिल्ली । बांग्लादेश में आम चुनाव अब केवल एक महीने दूर हैं और मौजूदा ओपिनियन पोल्स के मुताबिक तारीक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की जीत लगभग तय मानी जा रही है। इसके बावजूद चीन और पाकिस्तान का झुकाव जमात-ए-इस्लामी की ओर बना हुआ है, जिसे लेकर क्षेत्रीय राजनीति में कई सवाल खड़े हो रहे हैं।

चीन और पाकिस्तान दोनों ही इस बात से वाकिफ हैं कि चुनावों में बीएनपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर सकती है, जबकि जमात-ए-इस्लामी दूसरे स्थान पर रहकर विपक्ष की भूमिका निभाएगी। इसके बावजूद दोनों देश जमात के साथ लगातार संपर्क और संवाद बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, चीन और पाकिस्तान जमात को भारत के प्रभाव के खिलाफ एक महत्वपूर्ण संतुलनकारी शक्ति के तौर पर देखते हैं।

सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तानी अधिकारी विभिन्न स्तरों पर जमात के नेताओं के संपर्क में हैं। वहीं भारतीय एजेंसियां उस बैठक पर करीबी नजर बनाए हुए हैं, जिसमें बांग्लादेश में चीन के राजदूत याओ वेन ने जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान से मुलाकात की थी।

बांग्लादेश मामलों के जानकारों का कहना है कि चीन अच्छी तरह समझता है कि सत्ता में न आने के बावजूद जमात की राजनीतिक और सामाजिक प्रासंगिकता बनी रहेगी। पार्टी के पास मजबूत कैडर, व्यापक संगठनात्मक ढांचा और कई संस्थानों में प्रभाव है। जमात के पास सड़कों पर बड़ी संख्या में लोगों को उतारने की क्षमता भी है, जिसका इस्तेमाल भारत के हितों को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जा सकता है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब भारत बीएनपी नेतृत्व के साथ रिश्तों को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। हाल ही में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने बीएनपी संस्थापक खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में शिरकत की थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से शोक संदेश सौंपा था। अधिकारियों का कहना है कि भारत और बीएनपी के बीच रिश्तों में यह संभावित सुधार चीन और पाकिस्तान को रास नहीं आ रहा।

सूत्रों के अनुसार, दोनों देश चुनाव के बाद भी जमात के जरिए विरोध-प्रदर्शन और राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ावा देने की रणनीति अपना सकते हैं। भारत के लिए एक अस्थिर बांग्लादेश गंभीर चुनौती बन सकता है, खासकर सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षा हालात के लिहाज से। इससे घुसपैठ और आतंकी गतिविधियों का खतरा बढ़ सकता है, जिससे सुरक्षा एजेंसियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।

खुफिया एजेंसियों का मानना है कि जब भी भारत बांग्लादेश में निवेश करेगा या द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश करेगा, तब जमात को अशांति फैलाने के लिए आगे किया जा सकता है। जमात का छात्र संगठनों पर प्रभाव, साथ ही सेना और पुलिस में उसके समर्थकों की मौजूदगी, भारत-विरोधी ताकतों के लिए मददगार साबित हो सकती है।

चीन और पाकिस्तान दोनों ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के तहत बांग्लादेश में बड़े निवेश किए हैं। ऐसे में बीजिंग चाहता है कि किसी भी तरह की हिंसा उसके आर्थिक हितों को नुकसान न पहुंचाए। सूत्रों के मुताबिक, जमात ने आश्वासन दिया है कि संभावित हिंसा उनके निवेशों को प्रभावित नहीं करेगी।

अधिकारियों का यह भी कहना है कि जमात उन सभी ताकतों के साथ खड़ी रहने को तैयार है जो भारत के हितों के खिलाफ काम करती हैं। जमात नेतृत्व से मुलाकात कर चीन और पाकिस्तान और बीएनपी को भी यह संदेश देना चाहते हैं कि यदि उन्होंने उनकी लाइन से हटकर नीति अपनाई, तो देश में अस्थिरता पैदा की जा सकती है।

एक अधिकारी के अनुसार, मोहम्मद यूनुस के कार्यकाल में भारत-बांग्लादेश संबंध पहले ही काफी कमजोर हुए हैं और चीन व पाकिस्तान चाहते हैं कि चुनावों के बाद भी यह स्थिति बनी रहे।

–आईएएनएस

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