दस हज़ार से अधिक शिक्षकों ने राष्ट्रपति से डीयू के एडहॉक टीचरों को नियमित करने की मांग की

नई दिल्ली । दिल्ली विश्विद्यालय के दस हज़ार से अधिक शिक्षकों ने सभी एडहॉक टीचरों को नियमित करने की राष्ट्रपति से मांग की है।
दिल्ली विश्विद्यालग शिक्षक संघ के अध्यक्ष अजय कुमार भागी ने आज पत्रकारों को ऑनलाइन प्रेस कांफ्रेंस में यह जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि दो फरवरी को इसके लिए हस्ताक्षर अभियान शुरू हुआ था और एक सप्ताह से भी कम समय के भीतर करींब दस हज़ार टीचरों नेऑनलाइन याचिका पर हस्ताक्षर किये और आज राष्ट्रपति को इसकी प्रति सौंपी गई क्योंकि राष्ट्रपति ही इस विश्विद्यालग के विजिटर हैं।

डूटा ने इसकी एक प्रति प्रधानमंत्री कार्यालय, शिक्षा मंत्री, यूजीसी अध्यक्ष और दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति को भी सौंपी है। इसके माध्यम से, डूटा की मांग है कि सरकार को इस असामान्य परिस्थिति का संज्ञान लेना चाहिए और इस समस्या को हल करने के लिए यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय को साथ आकर सकारात्मक दिशा में काम करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय में सालों से तदर्थ व अस्थायी शिक्षकों की समस्या किसी से छिपी नहीं है। रिक्त पदों पर नियुक्ति के साथ-साथ तदर्थ व अस्थायी शिक्षकों के समायोजन की मांग ने एक बार फिर से जोर पकड़ लिया है।

इस बार दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) के नेतृत्व में 10000 से अधिक शिक्षकों ने ऑनलाइन याचिका पर हस्ताक्षर कर विश्वविद्यालय के लगभग 4500 तदर्थ और अस्थायी सहायक शिक्षकों के लिए स्थायी नियुक्ति के माध्यम से सामाजिक सुरक्षा की गुहार लगाई । डूटा अध्यक्ष ने बताया कि ये शिक्षक पूर्णकालिक, स्वीकृत, स्वीकृत एवं मौलिक पदों पर तदर्थ और अस्थायी आधार पर कार्यरत हैं। ऐसे में जब इनके पात्रता के मानदंड समान है तो रिक्त पदों पर वर्षों से कार्यरत इन शिक्षकों को ही क्यों न समायोजित किया जाय।

तदर्थ आधार पर काम करने वाले सहायक आचार्यो को आरंभ में दिल्ली विश्वविद्यालय एग्जीक्यूटिव काउंसिल के संकल्प के अनुसार 4 महीने (यानी 120 दिन) के लिए नियुक्त किया जाता है और जिन पदों पर वे काम करते हैं वे आमतौर पर वे पद स्थायी स्वीकृति पद होते हैं। स्थायी शिक्षकों की तुलना में तदर्थ/अस्थायी शिक्षकों की सेवा और कार्य स्थितियों में उल्लेखनीय अंतर है। इन शिक्षकों के साथ निरंतर स्थायी न हो पाने के कारण भेदभाव होता है और वे लंबे समय तक सेवाएं देने और शैक्षिणकउपलब्धियों के बावजूद सहायक आचार्य बने रहने के लिए मजबूर हैं।

डूटा का कहना है कि डीयू ने इन शिक्षकों को गरिमा और तनाव मुक्त जीवन के साथ काम करने के मौलिक अधिकार से वंचित कर दिया है। तदर्थ/अस्थायी शिक्षकों की आजीविका हमेशा खतरे में रहती है। ये शिक्षक वार्षिक वेतन वृद्धि, पदोन्नति, चिकित्सा लाभ, अवकाश आदि जैसे सभी उचित लाभों से वंचित हैं। महिला सहकर्मियों को लंबे समय तक मातृत्व और बाल देखभाल अवकाश प्राप्त करने के उनके अधिकार से वंचित कर दिया गया है। तदर्थ शिक्षकों की सेवा के नियम और शर्तें समान काम के लिए समान वेतन के सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं।

डूटा अध्यक्ष ने बताया कि 2010 के बाद से, ओबीसी विस्तार के कारण रिक्तियों की बढ़ी हुई संख्या को भरने के लिए विश्वविद्यालय और कॉलेजों में स्थायी नियुक्तियों के लिए कोई बड़ा अभियान नहीं चला है। जोकि बेहद आवश्यक था। विश्वविद्यालय और उसके संबद्ध कॉलेजों ने 2013, 2015, 2017 और 2019 में शिक्षण पदों का विज्ञापन किया था, लेकिन यह अधिकांश विभागों और कॉलेजों में साक्षात्कार आयोजित करने में विफल रहा। इन सभी पदों को स्थायी आधार पर भरने के दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्देश (दिसंबर, 2016) के बावजूद विज्ञापनों के अनुरूप नियुक्ति नहीं हो सकी।

इन पदों को स्थायी रूप से भरने के लिए शिक्षा मंत्रालय, यूजीसी और माननीय राष्ट्रपति के निर्देशों की बार-बार विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा भी अनदेखी की गई है। इन शिक्षकों ने वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय और इससे जुड़े कॉलेजों में कार्यरत कुल शिक्षकों की संख्या के 50 प्रतिशत को पार कर लिया है।
200-पॉइंट रोस्टर और डीओपीटी दिशानिर्देशों के अनुसार आरक्षण के सभी प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए विधिवत स्वीकृत पदों पर एक बार अवशोषण की मांग न तो अनुचित है और न ही पहली बार है। ऐसे कई उदाहरण हैं जहां तदर्थ/अस्थायी/अनुबंध में शिक्षकों को विशेष कानूनों के माध्यम से उनकी सेवाओं को नियमित करने के लिए समाहित किया गया है।

डीयू में ही वर्ष 1979-80 (अस्थायी अध्यादेश, XIII-A (Ord.13-A)) में इस तरह के कदम उठाए गए थे, सभी अस्थायी शिक्षकों को मौजूदा मूल पदों के खिलाफ स्थायी कर दिया गया था। कई राज्य सरकारें जैसे कर्नाटक, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, सिक्किम आदि ने कर्मचारियों को नियमित/अवशोषित किया है।

इस याचिका पर न केवल दिल्ली विश्वविद्यालय के तदर्थ/अस्थायी/स्थायी शिक्षकों ने हस्ताक्षर किए हैं बल्कि दिल्ली विश्वविद्यालय के कई कॉलेजों के प्रिंसिप, प्रोफेसर, डीन भी इसके समर्थन में हैं और इस याचिका पर हस्ताक्षर किए हैं।

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