सवालों से भागता बीसीसीआई

टी-20 विश्व कप अब इतिहास हो गया है। खिलाड़ियों ने भी कई इतिहास बनाए, इसे इस तरह से भी कह सकते हैं कि कई इतिहास बने, कई टूटे। लेकिन सच यह है कि भारत सेमीफाइनल से आगे नहीं बढ़ पाया और नौ सालों से आईसीसी के खिताबों का सूखा अब तक तो बरकरार ही रहा। भारत ने 2013 में आखिरी बार कोई आईसीसी टूर्नामेंट जीता था। उसके बाद सिर्फ शोर और तमाशा है। विश्व कप में इतिहास बना और भारत में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने भी एक नया इतिहास बनाया। मैदान पर खिलाड़ियों का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा। लेकिन सजा चयन समिति को भुगतना पड़ा। पहली बार किसी देश के क्रिकेट बोर्ड ने पूरी चयन समिति को भंग कर नई समिति के लिए आवेदन तलब किया है। देश के इतिहास में भी ऐसा पहली बार हुआ है। भारतीय क्रिकेट की कमान देश के शाहजादे यानी जय शाह के हाथ में है और वे क्रिकेट को भाजपा की तरह चलाने में लग गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसले को पलटते हुए जय शाह को फिर से सचिव के पद पर ला बिठाया है तो अब वे अपनी कर रहे हैं। स्याह-सफेद के मालिक बन गए हैं और क्रिकेट को अपने तरीके से हांकने में लग गए हैं। चयन समिति को भंग कर उन्होंने अपने इरादे और मंसूबे सब जाहिर कर दिए हैं कि वे भविष्य में भारतीय क्रिकेट को किस राह पर ले जाना चाह रहे हैं। वैसे पिछले कुछ सालों में बीसीसीआई ने जो राह पकड़ी है वह किसी से ढका-छुपा नहीं है।

विश्व कप में भारत के प्रदर्शन और चयन समिति को भंग करने पर बीसीसीआई सवालों में है। सवाल लगातार उठ रहे हैं लेकिन इन सवालों का जवाब देने में किसी को भी रुचि नहीं है। पहले ऐसा नहीं था। लेकिन अब सवालों से भागने की लगातार कोशिश हो रही है। हद तो यह है कि हाल के दिनों में बीसीसीआई ने कोई प्रेस कांफ्रेंस करने की भी जहमत नहीं उठाई है। वर्ना आमतौर पर टीमों के एलान के वक्त बोर्च सचिव, चयन समिति के अध्यक्ष और कप्तानों के प्रेस कांफ्रेंस करने की परंपरा रही है। लेकिन यह परंपरा खत्म कर दी गई है। टीम का एलान बीसीसीआई सोशल मीडिया पर ही कर डालता है। न कोई सवाल और न ही कोई जवाब। जाहिर है कि सवालों से बचने के लिए ही यह सारी कवायद की गई है।

विश्व कप में भारतीय प्रदर्शन सवालों में है तो इसकी वजह बोर्ड के कामकाज करने का तरीका ज्यादा है। बोर्ड जिस तरह से काम कर रहा है, उसे सही नहीं कहा जा सकता। ऐसा नहीं है कि भारतीय टीम का प्रदर्शन लगातार खराब रहा है। द्विपक्षीय सीरीज में भारतीय खिलाड़ियों ने दमदार प्रदर्शन किया। कई महत्त्वपूर्ण जीत भी दर्ज की। यह बात दीगर है कि आईसीसी के किसी ट्राफी को रोहित शर्मा या उससे पहले विराट कोहली के जियाले जीत नहीं पाए। इसकी कई सारी वजहें हो सकती हैं। टीम चयन भी उनमें से एक है। लेकिन सिर्फ यही एक वजह नहीं हो सकती। यह भी मान लिया कि खिलाड़ी दबाव में होते हैं। लेकिन यह दबाव आईपीएल में तो दिखाई नहीं देता। जहां तक मेरी समझ काम करती है दरअसल हार की एक बड़ी वजह विश्वसनीयता की कमी है। खिलाड़ियों और टीम प्रबंधन के बीच कहीं कुछ छूटता दिखाई दे रहा है। पहले टीम में इतना तामझाम नहीं होता था। ले-दे कर टीम का मैनजर होता था और बहुत हुआ तो मसाजर। अब तो टीम के साथ पूरे स्पोर्ट स्टाफ का अमला है। कई पूर्व खिलाड़ी और कई तरह के कोच। जाहिर है कि हर कोई अपने को तीसमार खां ही समझता है। इसलिए टकराव होता होगा। टकराव सतह पर भले न आता हो लेकिन अंदर-अंदर तो सब कुछ ठीक नहीं चलता होगा। विराट कोहली और अनिल कुंबले का टकराव बाहर आ गया था। बाद में विराट कोहली बनाम सौरभ गांगुली भी सामने आया। कहा तो यह भी जाता रहा कि चयन समिति के अध्यक्ष रहे चेतन शर्मा और विराट कोहली के बीच भी छत्तीस का आंकड़ा था। इससे टीम के प्रदर्शन पर असर तो पड़ना ही था। कमोबेश इसी तरह के हालात बने हुए हैं। गाज भले चयन समिति पर गिरी लेकिन टीम के इस प्रदर्शन के लिए पूरा बोर्ड जिम्मेदार है। सवाल यह है कि चेतन शर्मा हटाए जा सकते हैं तो जय शाह क्यों नहीं। पिछले कुछ सालों में टीम के साथ जितने प्रयोग किए गए, उस पर भी सवाल है। कई-कई तरह के कप्तान बनाए गए। कभी वह कप्तान तो कभी दूसरा। कप्तानों को लेकर भी कम प्रयोग नहीं हुए और जाहिर है कि बिना बोर्ड के गाइडलाइन के चयन समिति ने तो इस तरह के प्रयोग नहीं ही किए होंगे। इस तरह के प्रयोग पहले न हुए, न देखे गए। हाल के कुछ सालों में भारतीय टीम ने सात-आठ पार्ट टाइम या फुल टाइम कप्तान देखे हैं या कहें के झेले हैं। जय शाह इन सवालों से भाग रहे हैं।

यानी कहा जा सकता है कि जिस तरह देश चल रहा है, क्रिकेट भी उसी तरह से बोर्ड चला रहा है। सवाल उसकी कार्यशैली पर लगातार उठते रहे हैं लेकिन जवाब न आना है और न आता है। जय शाह के पिता देश के गृह मंत्री हैं। देश में उनकी तूती बोलती है और क्रिकेट में जय शाह की। सरकार के लिए भी पारदर्शिता का कोई मतलब नहीं और बोर्ड भी पारदर्शिता को महत्त्व नहीं देता है। क्रिकेट के कुछ पूर्व दिग्गज खिलाड़ियों का मानना है कि एक जमाने में जब दक्षिण का दबदबा था तो सात-आठ खिलाड़ी दक्षिण भारत से और उनमें भी कर्नाटक के खिलाड़ियों का बोलबाला था। अब पटेलों की बन आई है। इनका तो यहां तक कहना है कि आने वाले समय में चयन समिति का अध्यक्ष गुजरात के किसी व्यक्ति को बनाया जा सकता है। भले क्रिकेट में उसका अनुभव शून्य हो। इन खिलाड़ियों का मानना है कि चयन समिति के लिए कभी आवेदन नहीं मांगे गए थे। संबंधित क्षेत्रीय बोर्ड अपने खिलाड़ियों को चयन समिति के लिए नामित करते थे। अब एक नई परंपरा की शुरुआत बोर्ड ने की है, जो सही नहीं है। लेकिन इन सवालों का जवाब कौन दे। क्रिकेट में भी सरकारी चीयर्स लीडरों की कमी नहीं है, वे वही बोलते और लिखते हैं जो बोर्ड चाहता है। सुप्रीम कोर्ट के दखल और दिशा-निर्देशों के बाद लगा था कि क्रिकेट का कलंक धुलेगा लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसले को पलट कर लोगों की उम्मीदों को झटका दिया है। सुप्रीम कोर्ट को तो बोर्ड के अध्यक्ष और सचिव के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही करनी चाहिए थी लेकिन कोर्ट ने अपने फैसले को ही बदल कर क्रिकेट में सफेद को स्याह करने की और ज्यादा छूट दे दी।

बोर्ड के चयन समिति को बर्खास्त करने पर देसी कहावत याद आरही है कि खेत खाये गदहा और मार खाए जुलाहा। अब नई चयन समिति का इंतजार है। फिलहाल तो नजरें इस पर टिकी हैं कि नई चयन समिति किस तरह की होगी। अध्यक्ष से लेकर सदस्यों तक के नामों को लेकर उत्सुकता है। तब तक इंतजार करें, क्योंकि अब बोर्ड आईपीएल में व्यस्त होगा और खिलाड़ी भी। मामला पैसे का है और पैसा बोलता है।

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