बिहार में पपाया रिंग स्पॉट विषाणुजनित रोग से का पपीता उत्पादन घटा,

मुजफ्फरपुर: बिहार के किसान पिछले कुछ वर्षों से पपीता के पौधे में की जड़ गलन और पपाया रिंग स्पॉट विषाणुजनित रोग से परेशान हैं, जिससे पपीता का उत्पादन भी घटा है। इस बीच डॉ. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा, समस्तीपुर का दावा है कि इसका उपाय खोज लिया गया है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि किसानों में जानकारी के अभाव के कारण इसका भरपूर इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।

बताया जाता है कि बिहार में पपीता कुल 1.90 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में उगाया जाता है, जिससे कुल 42.72 हजार टन उत्पादन प्राप्त होता है। बिहार की उत्पादकता 22.45 टन प्रति हेक्टेयर है।

आंकड़ों के मुताबिक, राष्ट्रीय स्तर पर पपीता 138 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में उगाया जाता है, जिससे कुल 5989 हजार टन उत्पादन प्राप्त होता है। पपीता की राष्ट्रीय उत्पादकता 43.30 टन प्रति हेक्टेयर है।

बिहार के समस्तीपुर के पूसा स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सह मुख्य वैज्ञानिक( प्लांट पैथोलॉजी), प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय अनुसंधान परियोजना फल और एसोसिएट डायरेक्टर रीसर्च डॉ एस के सिंह ने आईएएनएस को बताया कि बिहार में पपीता की उत्पादकता राष्ट्रीय उत्पादकता से बहुत कम है, जिसका प्रमुख कारण इसमें लगने वाली विभिन्न बीमारियां है, विशेषकर पपीता का जड़ गलन एवम पपाया रिंग स्पॉट वायरस रोग बहुत बड़ा कारण है।

अक्टूबर माह में पपीता का पौधारोपण किया जाता है। इस महीने में लगाए गए पपीता में विषाणु रोग कम लगते है। पपीता में फूल आने से पहले यदि पपाया रिंग स्पॉट रोग पपीता में लग गया तो फल नहीं लगता है।

इस रोग को प्रबन्धित करने का प्रमुख सिद्धांत यह है की इस रोग को आने से अधिक से अधिक समय तक रोका जाय।

उन्होंने दावा किया कि अखिल भारतीय फल परियोजना और डॉ राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा ने तकनीक विकसित की है, उसके अनुसार खड़ी पपीता की फसल में विभिन्न विषाणुजनित बीमारियों को प्रबंधित करने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं।

उन्होंने बताया कि पपीता को पपाया रिंग स्पॉट विषाणु रोग से बचाने के लिए आवश्यक है कि 2 प्रतिशत नीम के तेल जिसमे आधा मिली प्रति लीटर स्टीकर मिलाकर एक एक महीने के अंतर पर छिड़काव आठवें महीने तक करना चाहिए।

उच्च क्वालिटी के फल एवं पपीता के पौधों में रोगरोधी गुण पैदा करने के लिए आवश्यक है कि यूरिया 4 ग्राम, जिंक सल्फेट 4 ग्राम तथा घुलनशील बोरान 4 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर एक एक महीने के अंतर पर छिड़काव पहले महीने से आठवें महीने तक छिड़काव करना चाहिए।

उपरोक्त रसायनों का अलग अलग छिड़काव करना चाहिए। जिंक सल्फेट एवम बोरान को एक साथ मिला देने से घोल जम जाता है, जिससे छिड़काव करना मुश्किल हो जाता है।

आईएएनएस को सिंह ने बताया कि पपीता की सबसे घातक बीमारी जड़ गलन के प्रबंधन के लिए आवश्यक है कि हेक्साकोनाजोल 2 मिली दवा प्रति लीटर पानी में घोलकर एक एक महीने के अंतर पर मिट्टी को खूब अच्छी तरह से भिगा दिया जाय, यह कार्य पहले महीने से लेकर आठवें महीने तक मिट्टी को उपरोक्त घोल से भिगाते रहना चाहिए।

उन्होंने कहा कि उपरोक्त बीमारियों के प्रबंधन की तकनीक विकसित की जा चुकी है, आवश्यकता इस पपीता उत्पादक किसानों तक पहुंचने की है।

–आईएएनएस

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