विश्व प्रसिद्ध मार्क्सवादी बुद्धिजीवी एजाज अहमद का इंतकाल

नई दिल्ली। विश्वविख्यात मार्क्सवादी सिद्धांतकार एजाज़ अहमद का कल अमरीका के कैलिफोर्निया में निधन हो गया।वह 81 वर्ष के थे। उनके परिवार में एक बेटा और एक बेटी हैं।

उत्तरप्रदेश के बिजनौर में 1941 में जन्मे श्री अहमद भारतीय उपमहाद्वीप के ही नहीं बल्कि अंतर राष्ट्रीय स्तर के विद्वान थे। भारत पाक विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया था।उनकी बाकी शिक्षा दीक्षा पाकिस्तान और अमेरिका में हुई थी। जनवादी लेखक संगठन और अखिल भर्तीयसंस्कृतिक प्रतिरोध अभियान ने उनके इंतकाल पर गहरा दुख व्यक्त किया है और भारतीय उपमहाद्वी का एक बड़ा चिंतक और बुद्धिजीवी बताया है।

जलेस ने अपने शोक संदेश में कहा है कि श्री अहमद ने इंतकाल की खबर से हम सभी स्तब्ध हैं।वे मार्क्सवादी सैद्धांतिकी,साहित्यिक-सांस्कृतिक अध्ययन और राजनीतिक विश्लेषण के क्षेत्र में वे पूरी दुनिया की सर्वोत्तम मनीषा का प्रतिनिधित्व करनेवाले विद्वान थे।

1941 में उत्तर प्रदेश में जन्मे एजाज़ अहमद का पालन-पोषण विभाजन के बाद पाकिस्तान में हुआ। अमेरिका और कनाडा के अनेक विश्वविद्यालयों में अध्यापन के बाद पिछली सदी के आख़िरी दशक में वे नयी दिल्ली स्थित नेहरू मेमोरियल म्यूज़िअम एंड लाइब्रेरी में प्रोफ़ेसोरियल फ़ेलो बनकर आये। भारत में वे जेएनयू के सेंटर फ़ॉर पोलिटिकल स्टडीज़ में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर भी रहे। 2017 से वे यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, इर्विन स्कूल ऑफ़ ह्यूमैनिटीज़ के तुलनात्मक साहित्य विभाग में प्रोफ़ेसर के पद पर थे। उनकी बहुचर्चित किताबों में से कुछ हैं: In Theory: Classes, Nations, Literatures;Lineages of the Present: Ideological and Political Genealogies of Contemporary South Asia; Iraq, Afghanistan and the Imperialism of Our Time.

एजाज़ साहब उत्तर-आधुनिकता और उत्तर-संरचनावाद की सैद्धांतिक प्रस्थापनाओं से सीधे टकरानेवाले विश्वख्यात बौद्धिक थे। देरीदा,फ़्रेडरीख जेमसन,एडवर्ड सईद जैसे सिद्धांतकारों की मान्यताओं का उनके द्वारा किया गया प्रत्याख्यान बहुचर्चित और समादृत रहा है। हिंदी की दुनिया में वे दिल्ली के त्रिवेणी सभागार में मार्क्सवाद के महत्त्व पर केंद्रित ‘पहल व्याख्यान’ के साथ चर्चा में आये। भारत में पहली बार आने पर प्रोफ़ेसर मुहम्मद हसन के साथ वे जनवादी लेखक संघ के केंद्रीय कार्यालय में भी आये,महमूद दरवेश की कविताओं के अनुवाद और अपनी कुछ कविताएं भी सुनायीं, जिन्हें हमने नया पथ में प्रकाशित किया।

तब से ले कर अब तक जनवादी लेखक संघ के साथ एजाज़ साहब का निकट संबंध बना रहा। 1997 में कोलकाता में आयोजित जलेस का राष्ट्रीय सम्मलेन उनके उद्घाटन-भाषण से आरंभ हुआ था। नया पथ के ‘प्रगतिशील आंदोलन के 75 साल’ पर केंद्रित अंक के लोकार्पण समारोह में भी उन्होंने
भाग लिया था।

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